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Raat Pashmine Ki (Hindi)

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साल:
2001
प्रकाशन:
Rupa Publications India Private Limited
भाषा:
hindi
फ़ाइल:
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1

Charlie Chaplin (Hindi)

言語:
hindi
ファイル:
PDF, 1.32 MB
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2

CHACHA CHAUDHARY DIGEST 155: CHACHA CHAUDHARY

年:
2017
言語:
english
ファイル:
PDF, 43.33 MB
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रात प मीने क

रात प मीने क
गुलज़ार

© गुलज़ार 2002
थम काशन
सातवाँ सं करण
काशक

: 2002
: 2012
:

पा प लकेशनस् इं डया ाइवेट ल मटे ड
7/16, अंसारी रोड, नई द ली 110 002

जस तरह तन झुलसती गम म
ठं डे द रया म डु ब कयाँ ले कर
दल को राहत नसीब होती है,
ऐसा ही इ मीनान होता है
तेरी अ छ सी न म को पढ़ कर!
लगता है ज़ दगी के द रया म
एक तारी लगा के नकले ह
ह कैसी नहाल होती है!
— बाबा1 आप के लये…

1. जनाब अहमद नद म क़ासमी

आज तेरी इक न म पढ़ थी,
पढ़ते-पढ़ते ल ज़ के कुछ रंग लब पर छू ट गये
आहंग ज़बाँ पे घुलती रही—
इक लु फ़ का रेला, सोच म कतनी दे र तलक लहराता रहा,
दे र तलक आँख रस से लबरेज़ रह —
सारा दन पेशानी पर,
अफ़शाँ के ज़र झल मल- झल मल करते रहे!!
— मनू1 तु हारे लये…

1. मंसूरा अहमद

न म-पञी

बो क -1
बो क -2
काएनात-1
काएनात-2
काएनात-3
काएनात-4
ख़ुदा-1
ख़ुदा-2
ख़ुदा-3
ख़ुदा-4
व त-1
व त-2
व त-3
फ़सादात-1
फ़सादात-2
फ़सादात-3
फ़सादात-4
फ़सादात-5
फ़सादात-6
मुंबई
आंसू-1
आंसू-2
आंसू-3
बुड्ढा द रया-1
बुड्ढा द रया-2
बुड्ढा द रया-3
द रया

पेन टग-1
पेन टग-2
पेन टग-3
बादल-1
बादल-2
पड़ोसी-1
पड़ोसी-2
कताब
आईना-1
आईना-2
उलझन
ग़ा लब
पंचम
वैनगॉग का एक ख़त
गु बारे
दे र आयद
एना कैरेनीना
ख़बर है
बौछार
इक न म
अगर ऐसा भी हो सकता…
नसी द्द न शाह के लए
कोहसार
रात
वारदात
ख़ुश आमदे द
स ाथ क वापसी
राख
-ख़ुदकुशी
वाद -ए-क मीर
रात तामीर कर
ज़मीन पर पड़ाव
केच
एक मंज़र…..
कु लू वाद

ख़ाली सम दर
स ज़ ल हे
म सया
अमजद ख़ान
शायर
माज़ीमु तक़ बल
हवामहल जयपुर
ख़च
गु तगू
जंगल
टोबा
टे क सह
दोनो
वही गली थी…
द ना मयु
व डयो
पतझड़
और सम दर मर गया…
पवत
ये सात रंगी धनक
दन
दो त
बीमार याद
इक क़
ज़ दाँनामा
चाँद समन
ज़ेरौ स
एक और दन
मेरे हाथ
मॉनसून
फ़टपाथ
तआकुब
चाँदघर

सोना
पो ट बॉ स
बु ढ़या रे
व मग पूल
हनीमून
उस रात
छु याँ ग मय क
बाबा बगलौस-1
बाबा बगलौस-2
अमलतास
पहाड़ क आग
इक इमारत
एक लाश
फ़तहपुर सीकरी
कचह रयां
क़ तान
हवेली
लबास
थड व ड
दद
शहद का छ ा’
रेप
‘रेड’
वमब डन
ग़ज़ल
वेणी

मेरा याल है…
मेरा याल है, नया मजमूआ लोग के सामने पेश करने से पहले हर शायर को एक बार तो
यह घबराहट ज़ र होती होगी — पता नह , अब लोग या कहगे। इ का का न म
लखते रहने, और छप जाने से अपने पूरे काम का अ दाज़ा नह हो पाता। जब धान क ढे री
लगती है तो पता चलता है क पछले साल म कतना मह बरसा, कतनी धूप खली।
ब त से मौज़ू पछले मजमूऐ से अलग ह। कह न म को पकने म दे र;  लगी, कह म दे र
से पका। कहने का हौसला कम था। हर बार बाबा ने थपक द और हौसला अफ़ज़ाई क ।
मनू ने हाथ पकड़ा और आगे बढ़ा दया। यह मजमूआ भी उसक बदौलत तैयार आ है।
मजमूऐ म एक बार फर ‘ वेणी’ शा मल है। वेणी ना तो मुस लस है, ना हाइकू, ना
तीन मसर म कही एक न म। इन तीन ‘फ़ा ज़’ म एक याल और एक इमेज का
तसलसुल मलता है। ले कन वेणी का फ़क़ इसके मज़ाज का फ़क है। तीसरा मसरा
पहले दो मसर के मफ़ म को कभी नखार दे ता है, कभी इज़ाफ़ा करता है या उन पर
‘कॅमट’ करता है। वेणी नाम इस लए दया था क संगम पर तीन न दयां मलती ह। गंगा,
जमना और सर वती। गंगा और जमना के धारे सतह पर नज़र आते ह ले कन सर वती जो
त ला के रा ते से बह कर आती थी, वह ज़मीन दोज़ हो चुक है। वेणी के तीसरे मसरे
का काम सर वती दखाना है जो पहले दो मसर म छु पी ई है।
उ मीद भी है, घबराहट भी क अब लोग या कहगे, और इससे बड़ा डर यह है कह
ऐसा ना हो क लोग कुछ भी ना कह!!
गुलज़ार

बो क -1
बो क याहने का अब व त क़रीब आने लगा है
ज म से छू ट रहा है कुछ कुछ
ह म डू ब रहा है कुछ कुछ
कुछ उदासी है, सुकूँ भी
सुबह का व त है पौ फटने का,
या झुटपटा शाम का है मालूम नह
यूं भी लगता है क जो मोड़ भी अब आएगा
वो कसी और तरफ़ मुड़ के चली जाएगी,
उगते ए सूरज क तरफ़
और म सीधा ही कुछ र अकेला जा कर
शाम के सरे सूरज म समा जाऊंगा!

बो क -2
नाराज़ है मुझ से बो क शायद
ज म का इक अंग चुप चुप सा है
सूजे से लगते है पांव
सोच म एक भंवर क आंख है
घूम घूम कर दे ख रही है
बो क , सूरज का टु कड़ा है
मेरे ख़ून म रात और दन घुलता रहता है
वह या जाने, जब वो ठे
मेरी रग म ख़ून क ग दश मद्धम पड़ने लगती है

काएनात-1
बस च द करोड़ साल म
सूरज क आग बुझेगी जब
और राख उड़ेगी सूरज से
जब कोई चाँद न डू बेगा
और कोई ज़म न उभरेगी
तब ठं डा बुझा इक कोयला सा
टु कड़ा ये ज़म का घूमेगा
भटका भटका
मद्धम ख़ कस ी रोशनी म!
म सोचता ँ उस व त अगर
काग़ज़ पे लखी इक न म कह उड़ते उड़ते
सूरज म गरे
तो सूरज फर से जलने लगे!!

काएनात-2
अपने “स तूरी” सतारे से अगर बात क ं
तह-ब-तह छ ल के आफ़ाक़ क पत
कैसे प ंचेगी मेरी बात ये अफ़लाक के उस पार भला?
कम से कम “नूर क र तार” से भी जाए अगर
एक सौ स दयां तो ख़ामोश ख़ला से
गुज़रने म लगगी
कोई माद्दा है मेरी बात म तो
“नून” के नु ते सी रह जाएगी “ लैक होल” गुज़र के
या वो समझेगा?
मै समझाऊंगा या?
“स तूरी” Centuar

काएनात-3
ब त बौना है ये सूरज……!
हमारी कहकशाँ क इस नवाही सी ‘गैले सी’ म
ब त बौना सा ये सूरज जो रौशन है….
ये मेरी कुल हद तक रौशनी प ंचा नह पाता
म माज़ और जुपीटर से जब गुज़रता ँ
भंवर से, लैक होल के
मुझे मलते ह र ते म
सयह गरदाब चकराते ही रहते ह
मसल के जु तजु के नंगे सहरा म वापस
फक दे ते ह
ज़म से इस तरह बांधा गया ँ म
गले से ै वट का दाएमी प ा नह खुलता!

काएनात-4
रात म जब भी मेरी आंख खुले
नंगे पांव ही नकल जाता ँ
आसमान से गुज़र जाता ँ
कहकशाँ छू के नकलती है जो इक पगड डी
अपने पछवाड़े के “स तूरी” सतारे क तरफ़
धया तार पे पांव रखता
चलता रहता ँ यही सोच के म
कोई स यारा अगर जागता मल जाए कह
इक पड़ोसी क तरह पास बुला ले शायद
और कहे
आज क रात यह रह जाओ
तुम ज़म पर हो अकेले
म यहां त हा ँ

ख़ुदा-1
बुरा लगा तो होगा ऐ ख़ुदा तुझ,े
आ म जब,
ज हाई ले रहा था म—
आ के इस अमल से थक गया ँ म!
म जब से दे ख सुन रहा ँ,
तब से याद है मुझे,
ख़ुदा जला बुझा रहा है रात दन,
ख़ुदा के हाथ म है सब बुरा भला—
आ करो!
अजीब सा अमल है ये
ये एक फ़ज़ गु तगू,
और एकतफ़ा— एक ऐसे श स से,
याल जसक श ल है
याल ही सबूत है।

ख़ुदा-2
म द वार क इस जा नब !ँ
इस जा नब तो धूप भी है, ह रयाली भी!
ओस भी गरती है प पर,
आ जाये तो आलसी कोहरा,
शाख़ पे बैठा घंट ऊँघता रहता है।
बा रश ल बी तार पर नटनी क तरह थरकती,
आँख से गुम हो जाती है,
जो मौसम आता है, सारे रस दे ता है!
ले कन इस क ची द वार क सरी जा नब,
य ऐसा स ाटा है
कौन है जो आवाज़ नह करता ले कन—
द वार से टे क लगाये बैठा रहता है।

ख़ुदा-3
पछली बार मला था जब म
एक भयानक जंग म कुछ मस फ़ थे तुम
नए नए ह थयार क रौनक़ से काफ़ ख़ुश लगते थे
इससे पहले अ तुला म
भूख से मरते ब च क लाश द नाते दे खा था
और इक बार… एक और मु क म ज़लज़ला दे खा
कुछ शहर के शहर गरा के सरी जा नब
लौट रहे थे
तुम को फ़लक से आते भी दे खा था मने
आस पास के स यार पर धूल उड़ाते
कूद फलांग के सरी नया क ग दश
तोड़ ताड़ के गैले सीज़ के महवर तुम
जब भी ज़म पर आते हो
भ चाल चलाते और सम दर खौलाते हो
बड़े ‘इरै टक’ से लगते हो
काएनात म कैसे लोग क सोहबत म रहते हो तुम

ख़ुदा-4
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी दे खी मने—
काले घर म सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पट जायगे,
मने एक चराग़ जला कर,
अपना र ता खोल लया
तुमने एक सम दर हाथ म लेकर, मुझ पर ढ़े ल दया
मने नूह क क ती उसके ऊपर रख द
काल चला तुमने, और मेरी जा नब दे खा
मने काल को तोड़ के ल हा ल हा जीना सीख लया
मेरी ख़ुद को तुम ने च द चम कार से मारना चाहा
मेरे इक यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लया—
मौत क शह दे कर तुमने समझा था अब तो मात ई
मने ज म का ख़ोल उतार के स प दया-और
ह बचा ली
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम दे खो बाज़ी

व त-1
म उड़ते ए पं छय को डराता आ
कुचलता आ घास क कल ग़यां
गराता आ गदन इन दर त क , छु पता आ
जनके पीछे से
नकला चला जा रहा था वह सूरज
तआक़ब म था उसके म
गर तार करने गया था उसे
जो ले के मेरी उ का एक दन भागता जा रहा था

व त—2
व त क आँख पे पट् ट बाँध के।
चोर सपाही खेल रहे थे—
रात और दन और चाँद और म—
जाने कैसे इस ग दश म अटका पाँव,
र गरा जा कर म जैस,े
रौश नय के ध के से
परछा ज़म पर गरती है!
धे या छू ने से पहले ही—
व त ने चोर कहा और आँख खोल के
मुझको पकड़ लया—

व त-3
तु हारी फ़क़त म जो गुज़रता है,
और फर भी नह गुज़रता,
म व त कैसे बयाँ क ँ , व त और या है?
क व त बांगे जरस नह जो बता रहा है
क दो बजे ह,
कलाई पर जस अक़ाब को बाँध कर
समझता ँ व त है,
वह वहाँ नह है!
वह उड़ चुका
जैसे रंग उड़ता है मेरे चेहरे का, हर तह युर पे,
और दखता नह कसी को,
वह उड़ रहा है क जैसे इस बेकराँ सम दर से
भाप उड़ती है
और दखती नह कह भी,
क़द म वज़नी इमारत म,
कुछ ऐसे रखा है, जैसे काग़ज़ पे बट् टा रख द,
दबा द, तारीख़ उड़ ना जाये,
म व त कैसे बयाँ क ँ , व त और या है?
कभी कभी व त यूँ भी लगता है मुझको
जैस,े ग़लाम है!
आफ़ताब का इक दहकता गोला उठा के
हर रोज़ पीठ पर वह, फ़लक पे चढ़ता है च पा
च पा क़दम जमा कर,
वह पूरा कोहसार पार कर के,
उतारता है, उफ़क़ क दहलीज़ पर दहकता
आ सा प थर,
टका के पानी क पतली सुतली पे, लौट

जाता है अगले दन का उठाने गोला,

और उसके जाते ही
धीर धीरे वह पूरा गोला नगल के बाहर नकलती है
रात, अपनी पीली सी जीभ खोले,
ग़लाम है व त ग दश का,
क जैसे उसका ग़लाम म !ँ !

फ़सादात-1
उफ़क़ फलाँग के उमड़ा जूम लोग का
कोई मनारे से उतरा, कोई मुँडेर से
कसी ने सी ढ़याँ लपक , हटा द वार—
कोई अज़ाँ से उठा है, कोई जरस सुन कर!
ग़ सीली आँख म फुँकारते हवाले लये,
गली के मोड़ पे आ कर ये ह जमा सभी!
हर इक के हाथ म प थर ह कुछ अक़ द के
ख़ुदा क ज़ात को संगसार करने आये ह!!

फ़सादात-2
ौजज़ा कोई भी उस शब ना आ—
जतने भी लोग थे उस रोज़ इबादतगाह म,
सब के होठ पे आ थी,
और आंख म चराग़ां था यक़ का
ये ख़ुदा का घर है,
ज़लज़ले तोड़ नह सकते इसे, आग जला सकती नह !
सकड़ मौजज़ क सब ने हकायात सुनी थ
सकड़ो नाम से उन सब ने पुकारा उसको,
ग़ैब से कोई भी आवाज़ नह आई कसी क ,
ना ख़ुदा क -ना पु लस क !!
सब के सब भूने गये आग म, और भ म ये।
मौजज़ा कोई भी उस शब ना आ!!

फ़सादात-3
मौजज़े होते ह,—ये बात सुना करते थे!
व त आने पे मगर—
आग से फूल उगे, और ना ज़म से कोई द रया
फूटा
ना सम दर से कसी मौज ने फका आँचल,
ना फ़लक से कोई क ती उतरी!
आज़माइश क थी कल रात ख़ुदा के लये
कल मेरे शहर म घर उनके जलाये सब ने!!

फ़सादात-4
अपनी मज़ से तो मज़हब भी नह उसने चुना था,
उसका मज़हब था जो माँ बाप से ही उसने
वरासत म लया था—
अपने माँ बाप चुने कोई ये मुम कन ही कहां है
मु क म मज़ थी उसक न वतन उसक रज़ा से
वो तो कुल नौ ही बरस का था उसे य चुन कर,
फ़क़ादाराना फ़सादात ने कल क़ ल कया—!!

फ़सादात-5
आग का पेट बड़ा है!
आग को चा हए हर लहज़ा चबाने के लये
ख़ु क करारे प ,े
आग कर लेती है तनक पे गुज़ारा ले कन—
आ शयान को नगलती है नवाल क तरह,
आग को स ज़ हरी टह नयाँ अ छ नह लगत ,
ढूं डती है, क कह सूखे ये ज म मल!
उसको जंगल क हवा रास ब त है फर भी,
अब ग़रीब क कई ब तय पर दे खा है हमला करते,
आग अब मं दरो-म जद क ग़ज़ा खाती है!
लोग के हाथ म अब आग नह —
आग के हाथ म कुछ लोग ह अब

फ़सादात-6
शहर म आदमी कोई भी नह क़ ल आ,
नाम थे लोग के जो क़ ल ये।
सर नह काटा, कसी ने भी, कह पर कोई—
लोग ने टो पयाँ काट थ क जनम सर थे!
और ये बहता आ सुख़ ल है जो सड़क पर,
ज़बह होती ई आवाज़ क गदन से गरा था

मुंबई
रात जब मुंबई क सड़क पर
अपने पंज को पेट म ले कर
काली ब ली क तरह सोती है
अपनी पलक नह गराती कभी,—
साँस क ल बी ल बी बौछार
उड़ती रहती ह ख़ु क सा हल पर!

आंसू-1
अ फ़ाज़ जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते
रहते ह मेरे चार तरफ़,
अ फ़ाज़ जो मेरे गद पतंग क सूरत उड़ते
रहते ह रात और दन
इन ल ज़ के करदार ह, इनक श ल ह,
रंग प भी ह-और उ भी!
कुछ ल ज़ ब त बीमार ह, अब चल सकते नह ,
कुछ ल ज़ तो ब तरेमग पे ह,
कुछ ल ज़ ह जनको चोट लगती रहती ह,
म प ट् टयाँ करता रहता !ँ
अ फ़ाज़ कई, हर चार तरफ़ बस यूँ ही
थूकते रहते ह,
गाली क तरह—
मतलब भी नह , मक़सद भी नह —
कुछ ल ज़ ह मुंह म रखे ये
‘चूइंगम’ क तरह हम जनक जुगाली करते ह!
ल ज़ के दाँत नह होते, पर काटते ह,
और काट ल तो फर उनके ज़ म नह भरते!
हर रोज़ मदरस म ‘ट चर’ आते ह गाल भर भर के,
छ: छ: घंटे अ फ़ाज़ लुटाते रहते ह,
बरस के घसे, बेरंग से, बेआहंग से,
फ के ल ज़ क जनम रस भी नह ,
मानी भी नह !
इक भीगा आ, छ का छ का, वह ल ज़ भी है,
जब दद छु ए तो आँख म भर आता है

कहने के लये लब हलते नह ,
आँख से अदा हो जाता है!!

आंसू-2
सुना है मट् ट पानी का अज़ल से एक र ता है,
जड़ मट् ट म लगती ह,
जड़ म पानी रहता है।
तु हारी आँख से आँसू का गरना था क दल
म दद भर आया,
ज़रा से बीज से क पल नकल आयी!!
जड़ मट् ट म लगती ह,
जड़ म पानी रहता है!!

आंसू-3
शीशम अब तक सहमा सा चुपचाप खड़ा है,
भीगा भीगा ठठु रा ठठु रा।
बूँद प ा प ा कर के,
टप टप करती टू टती ह तो ससक क आवाज़
आती है!
बा रश के जाने के बाद भी,
दे र तलक टपका रहता है!
तुमको छोड़े दे र यी है—
आँसू अब तक टू ट रहे ह

बुड्ढा द रया-1
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा द रया!
कोई पूछे तुझको या लेना, या लोग कनार
पर करते ह,
तू मत सुन, मत कान लगा उनक बात पर!
घाट पे ल छ को गर झूठ कहा है साले माधव ने,
तुझको या लेना ल छ से? जाये, जा के डू ब मरे!
यही तो ःख है द रया को!
ज मी थी तो “आँवल नाल” उसी के हाथ म स पी
थी झूलन दाई ने,
उसने ही सागर प ँचाये थे वह “लीड़े”,
कल जब पेट नज़र आयेगा, डू ब मरेगी
और वह लाश भी उस को ही गुम करनी होगी!
लाश मली तो गाँव वाले ल छ को बदनाम करगे!!
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा द रया!

बुड्ढा द रया-2
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा द रया
दन दोपहरे, मने इसको ख़राटे लेते दे खा है
ऐसा चत बहता है दोन पाँव पसारे
प थर फेक, टांग से खच, बगले आकर च चे मार
टस से मस होता ही नह है
च क उठता है, जब बा रश क बूँद
आ कर चुभती ह
धीरे धीरे हाँफने लग जाता है उसके पेट का पानी।
तल मल करता, रेत पे दोन बाह मारने लगता है
बा रश पतली पतली बूँद से जब उसके पेट म
गुदगुद करती है!
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा द रया!!

बुड्ढा द रया-3
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा द रया!
पेट का पानी धीरे धीरे सूख रहा है,
बला बला रहता है अब!
कूद के गरता था ये जस प थर से पहले,
वह प थर अब धीरे से लटका के इस को
अगले प थर से कहता है,—
इस बुड्ढे को हाथ पकड़ के, पार करा दे !!

द रया
मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता रहता
है ये द रया!
छोट छोट वा हश ह कुछ उसके दल म—
रेत पे रगते रगते सारी उ कट है,
पुल पर चढ़ के बहने क वा हश है दल म!
जाड़ म जब कोहरा उसके पूरे मुँह पर आ जाता है,
और हवा लहरा के उसका चेहरा प छ के जाती है—
वा हश है क एक दफ़ा तो
वह भी उसके साथ उड़े और
जंगल से ग़ायब हो जाये!!
कभी कभी यूँ भी होता है,
पुल से रेल गुज़रती है तो बहता द रया,
पल के पल बस क जाता है—
इतनी सी उ मीद लये—
शायद फर से दे ख सके वह, इक दन उस
लड़क का चेहरा,
जसने फूल और तुलसी उसको पूज के अपना
वर माँगा था—
उस लड़क क सूरत उसने,
अ स उतारा था जब से, तह म रख ली थी!!

पेन टग-1
खड़खड़ाता आ नकला है उफ़क़ से सूरज,
जैसे क चड़ म फँसा प हया धकेला हो कसी ने
च बे ट बे से कनार पे नज़र आते ह।
रोज़ सा गोल नह है!
उधड़े-उधड़े से उजाले ह बदन पर
और चेहरे पे खरोच के नशाँ ह!!

पेन टग-2
रात जब गहरी न द म थी कल
एक ताज़ा सफ़ेद कैनवस पर,
आ तश लाल सुख़ रंग से,
मने रौशन कया था इक सूरज!
सुबह तक जल चुका था वह कैनवस,
राख बखरी ई थी कमरे म!!

पेन टग-3
“जोरहट” म, एक दफ़ा
र उफ़क़ के ह के ह के कोहरे म
‘हेमन ब आ’ के चाय बागान के पीछे ,
चाँद कुछ ऐसे रखा था,——
जैसे चीनी मट् ट क , चमक ली ‘कैटल” रखी हो!!

बादल-1
रात को फर बादल ने आकर
गीले गीले पंज से जब दरवाज़े पर द तक द ,
झट से उठ के बैठ गया म ब तर म
अ सर नीचे आ कर ये क ची ब ती म,
लोग पर ग़राता है
लोग बेचारे डा बर लीप के द वार पर—
बंद कर लेते ह झरयाँ
ता क झाँक ना पाये घर के अ दर—
ले कन, फर भी—
ग़राता, चघाड़ता बादल—
अ सर ऐसे लूट के ले जाता है ब ती,
जैसे ठाकुर का कोई ग़ डा,
बदम ती करता नकले इस ब ती से!!

बादल-2
कल सुबह जब बा रश ने आ कर खड़क पर
द तक द , थी
न द म था म-बाहर अभी अँधेरा था!
ये तो कोई व त नह था, उठ कर उससे मलने का!
मने पदा ख च दया—
गीला गीला इक हवा का झ का उसने
फूँका मेरे मुँह पर, ले कन—
मेरी ‘से स ऑफ़ हयुमर’ भी कुछ न द म थी—
मने उठ कर ज़ोर से खड़क के पट
उस पर भेड़ दये—
और करवट ले कर फर ब तर म डू ब गया!
शायद बुरा लगा था उसको——
ग़ से म खड़क के काँच पे
ह थड़ मार के लौट गयी वह, दोबारा फर
आयी नह ——
खड़क पर वह चटख़ा काँच अभी बाक़ है!!

पड़ोसी-1
कुछ दन से पड़ोसी के
घर म स ाटा है,
ना रे डयो चलता है,
ना रात को आँगन म
उड़ते ये बतन ह।
उस घर का पला कु ा—
खाने के लये दन भर,
आ जाता है मेरे घर
फर रात उसी घर क
दहलीज़ पे सर रख कर
सो जाया करता है!

पड़ोसी-2
आँगन के अहाते म
र सी पे टँ गे कपड़े
अफ़साना सुनाते ह
एहवाल बताते ह
कुछ रोज़ ठाई के,
माँ बाप के घर रह कर
फर मेरे पड़ोसी क
बीवी लौट आयी है।
दो चार दन म फर,
पहले सी फ़ज़ा होगी,
आकाश भरा होगा,
और रात को आँगन से
कुछ “कॉमेट” गुज़रगे!
कुछ त त रयां उतरगी!

कताब
कताब झांकती ह ब द अलमारी के शीश से
बड़ी हसरत से तकती ह
महीन अब मुलाक़ात नही होत
जो शाम इन क सोहबत म कटा करती थ ,
अब अ सर
गुज़र जाती ह ‘कम यूटर’ के पद पर
बड़ी बेचैन रहती ह कताब….
इ ह अब न द म चलने क आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती ह,
जो क़दर वो सुनाती थ ।
क जन के ‘सैल’ कभी मरते नह थे
वो क़दर अब नज़र आती नह घर म
जो र ते वो सुनाती थ
वह सारे उधड़े उधड़े ह
कोई सफ़हा पलटता ँ तो इक ससक नकलती है
कई ल ज़ के माने गर पड़े ह
बना प के सुखे टु ड लगते ह वो सब अ फ़ाज़
जन पर अब कोई माने नह उगते
ब त सी इसतलाह ह
जो म के सकूर क तरह बखरी पड़ी ह
गलास ने उ ह मत क कर डाला
जुबान पर ज़ाएका आता था जो स हे पलटने का
अब उंगली ‘ लक’ करने से बस इक
झपक गुज़रती है
ब त कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
कताब से जो ज़ाती रा ता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे

कभी गोद म लेते थे,
कभी घुटन को अपने रहल क सूरत बना कर
नीम सजदे म पढ़ा करते थे, छू ते थे जब से
वो सारा इ म तो मलता रहेगा बाद म भी
मगर वो जो कताब म मला करते थे सूखे फूल
और महके ए के
कताब मांगने, गरने, उठाने के बहाने र ते बनते थे
उनका या होगा?
वो शायद अब नह ह गे!

आईना-1
ये आईना बोलने लगा है,
म जब गुज़रता ँ सी ढ़य से,
ये बात करता है—आते जाते म पूछता है
“कहाँ गयी वह फतुई तेरी——
ये कोट नेक-टाई तुझ पे फबती नह , ये
मसनूई लग रही है—”
ये मेरी सूरत पे नुकताचीनी तो ऐसे करता है
जैसे म उसका अ स ँ—
और वो जायज़ा ले रहा है मेरा।
“तु हारा माथा कुशादा होने लगा है ले कन,
तु हारे ‘आइ ो’ सकुड़ रहे ह—
तु हारी आँख का फ़ासला कमता जा रहा है—
तु हारे माथे क बीच वाली शकन ब त गहरी
हो गयी है—”
कभी कभी बेतक लुफ़ से बुला के कहता है!
“यार भोलू——
तुम अपने द तर क मेज़ क दा हनी तरफ़ क
दराज़ म रख के
भूल आये हो मु कुराहट,
जहाँ पे पोशीदा एक फ़ाइल रखी थी तुमने
वो मु कुराहट भी अपने होठ पे च पाँ कर लो,”
इस आईने को पलट के द वार क तरफ़ भी
लगा चुका ँ—
ये चुप तो हो जाता है मगर फर भी दे खता है—
ये आईना दे खता ब त है!
ये आईना बोलता ब त है!!

आईना-2
म जब भी गुज़रा इस आईने से,
इस आईने ने कुतर लया कोई ह सा मेरा।
इस आईने ने कभी मेरा पूरा अ स वापस
नह कया है—
छु पा लया मेरा कोई पहलू,
दखा दया कोई जा वया ऐसा,
जस से मुझको, मेरा कोई ऐैब दख ना पाये।
म ख़ुद को दे ता र ँ तस ली
क मुझ सा तो सरा नह है!!

उलझन
एक पशेमानी रहती है
उलझन और गरानी भी….
आओ फर से लड़ कर दे ख
शायद इस से बेहतर कोई
और सबब मल जाए हम को
फर से अलग हो जाने का!!

ग़ा लब
रात को अ सर होता है, परवाने आकर,
टे बल लै प के गद इक े हो जाते ह
सुनते ह, सर धुनते ह
सुन के सब अश’आर ग़ज़ल के
जब भी म द वान-ए-ग़ा लब
खोल के पढ़ने बैठता ँ
सुबह फर द वान के रौशन स ह से
परवान क राख उठानी पड़ती है।।

पंचम1
याद है बा रश का दन पंचम
जब पहाड़ी के नीचे वाद म,
धुंद से झाँक कर नकलती ई,
रेल क पट रयाँ गुज़रती थ —!
धुंद म ऐसे लग रहे थे हम,
जैसे दो पौधे पास बैठे ह ,।
हम ब त दे र तक वहां बैठे,
उस मुसा फ़र का ज़ करते रहे,
जस को आना था पछली शब, ले कन
उसक आमद का व त टलता रहा!
दे र तक पट रय पे बैठे ये
े न का इंतज़ार करते रहे।
े न आयी, ना उसका व त आ,
और तुम यूँ ही दो क़दम चल कर,
धुंद पर पाँव रख के चल भी दये
मै अकेला ँ धुंद म पंचम!!

1. आर.डी. बमन

वैनगॉग का एक ख़त
तारपीन तेल म कुछ घोली यी धूप क ड लयाँ,
मने कैनवस पे बखेरी थ ,—मगर
या क ँ , लोग को उस धूप म रंग दखते नह !
मुझसे कहता था ‘ थयो’ चच क स वस कर लूँ—
और उस गरजे क ख़दमत म गुज़ा ँ म
शबोरोज़ जहाँ—
रात को साया समझते ह सभी, दन को सराब
का सफ़र!
उनको माद्दे क हक़ क़त तो नज़र आती नह ,
मेरी त वीर को कहते ह, तख़ युल ह,
ये सब वाहमा ह!
मेरे ‘कैनवस’ पे बने पेड़ क तफ़ंसील तो दे ख,
मेरी तख़लीक़ ख़ुदाव द के उस पेड़ से कुछ कम
तो नह है!
उसने तो बीज को इक म दया था शायद,
पेड़ उस बीज क ही कोख म था, और नुमायाँ
भी आ!
जब कोई टहनी झुक , प ा गरा, रंग अगर ज़द आ,
उस मुस वर ने कहाँ दख़ल दया था,
जो आ सो आ——
मने हर शाख़ पे, प के रंग प पे मेहनत क है,
उस हक़ क़त को बयाँ करने म जो ने-हक़ क़त
है असल म
इन दर
का ये सँभला आ क़द तो दे खो,
कैसे ख़ुददार
् ह ये पेड़, मगर कोई भी मग़ र नह ,

इनको शे‘र क तरह मने कया है मौज़ूँ!
दे खो ताँबे क तरह कैसे दहकते ह ख़ज़ाँ के प ,े
“कोयला कान ” म झ के ये मज़ र क श ल,
लालटे न ह, जो शब दे र तलक जलती रह
आलु पर जो गुज़र करते ह कुछ लोग,
‘पोटे टो ईटज़’
एक ब ी के तले, एक ही हाले म बँधे लगते ह सारे!
मैने दे खा था हवा खेत से जब भाग रही थी,
अपने कैनवस पे उसे रोक लया——
‘रोलाँ’ वह ‘ चठ् ठ रसाँ’, और वो कूल म
पढ़ता लड़का,
‘ज़द ख़ातून’, पड़ोसन थी मेरी,——
फ़ानी लोग को तग़ युर से बचा कर, उ ह
कैनवस पे तवारीख़ क उ द ह—!
सालहा साल ये तसवीर बनाय मने,
मेरे न क़ाद मगर बोले नह —
उनक ख़ामोशी खटकती थी मेरे कान म,
उस पे तसवीर बनाते ये इक क वे क वह
चीख़ पुकार——
क वा खड़क पे नह , सीधा मेरे कान पे आ
बैठता था,
कान ही काट दया है मने!
मेरे ‘पैलेट’ पे रखी धूप तो अब सूख गयी है,
तारपीन तेल म जो घोला था सूरज मने,
आसमाँ उसका बछाने के लये——
च द बा ल त का कैनवस भी मेरे पास नह है!
म यहाँ “रेमी” म ँ,
“से ट रेमी” के दवाख़ाने म थोड़ी सी मर मत के
लये भत आ ँ!
उनका कहना है कई पुज़ मेरे ज़हन के अब
ठ क नह ह——

मुझे लगता है वो पहले से सवा तेज़ ह अब!

ग़ बारे
इक स ाटा भरा आ था,
एक ग़ बारे से कमरे म,
तेरे फ़ोन क घंट के बजने से पहले।
बासी सा माहौल ये सारा
थोड़ी दे र को धड़का था
साँस हली थी, न ज़ चली थी,
मायूसी क झ ली आँख से उतरी कुछ ल ह को——
फर तेरी आवाज़ को, आख़री बार “ख़ुदा हा फ़ज़”
कह के जाते दे खा था!
इक स ाटा भरा आ है,
ज म के इसी ग़ बारे म,
तेरे आख़री फ़ोन के बाद——!!

दे र आयद
आठ ही ब लयन उ ज़म क होगी शायद
ऐसा ही अ दाज़ा है कुछ ‘साइ स’ का
चार अशा रया छ: ब लयन साल क उ तो
बीत चुक है
कतनी दे र लगा द तुम ने आने म
और अब मल कर
कस नया क नयादारी सोच रही हो
कस मज़हब और ज़ात और पात क फ़ लगी है
आओ चल अब——
तीन ही ‘ ब लयन’ साल बचे ह!

एना कैरेनीना
“वथ” जो से ट है मट् ट का
“वथ” जो तुमको भला लगता है
“वथ” के से ट क ख़ु बू थी थयेटर म, गयी
रात के शो म,
तुमको दे खा तो नह , से ट क खु बू से नज़र
आती रह तुम!
दो दो फ़ म थ , बयक व त जो पद पे र‘वां थ ,
पद पर चलती यी फ़ म के साथ,
और इक फ़ म मेरे ज़हन पे भी चलती रही!
‘एना’ के रोल म जब दे ख रहा था तुमको,
‘टॉल टॉय’ क कहानी म हमारी भी कहानी के
सरे जुड़ने लगे थे—
सूखी मट् ट पे चटकती यी बा रश का वह म ज़र,
घास के स धे, हरे रंग,
ज म क मट् ट से नकली यी खु बू क वो याद—
मंज़र-ए-र स म सब दे ख रहे थे तुम को,
और म पाँव के उस ज़ मी अंगूठे पे बंधी पट् ट को,
शॉट के े म म जो आई ना थी
और वह छोटा अदाकार जो उस र स म
बे वजह तु ह छू के गुज़रता था,
जसे झड़का था मने!
मने कुछ शाट तो कटवा भी दए थे उस के
कोहरे के सीन म, सचमुच ही ठठु रती यी
महसूस य

हालाँ क याद था गम म बड़े कोट से
उलझी थ ब त तुम!
और मसनूई धुएँ ने जो कई आफ़त क थ ,
हँस के इतना भी कहा था तुमने!
“इतनी सी आग है,
और उस पे धुएँ को जो गुमां होता है वो
कतना बड़ा है”
बफ़ के सीन म उतनी ही हस थ कल रात,
जतनी उस रात थ , फ़ मा के पहलगाम से
जब लौटे थे दोन ,
और होटल म ख़बर थी क तु हारे शौहर,
सुबह क पहली लाइट से वहाँ प ँचे ए ह!
रात क रात, ब त कुछ था जो तबद ल आ,
तुमने उस रात भी कुछ गो लयाँ खा लेने क
को शश क थी,
जस तरह फ़ म के आ ख़र म भी
“एना कैरेनीना”
ख़ुदकुशी करती है, इक रेल के नीचे आ कर—!
आ ख़री सीन म जी चाहा क मै रोक ँ उस
रेल का इ जन,
आँख ब द कर ल , क मालूम था वह ‘ए ड’ मुझे!
पसेम ज़र म बलकती यी मौसीक़ ने उस
र ते का अ जाम सुनाया,
जो कभी बाँधा था हमने!
“वथ” के से ट क ख़ु बू थी, थएटर म,
गयी रात ब त!

ख़बर है
नज़ामे-जहाँ, पढ़ के दे खो तो कुछ इस तरह
चल रहा है!
इराक़ और अमरीका क जंग छड़ने के इमकान
फर बढ़ गये ह।
अ लफ़ लैला क दा ताँ वाला वो शहरे-बग़दाद
ब कुल तबह हो चुका है।
ख़बर है कसी श स ने गंजे सर पर भी अब
बाल उगाने क इक ‘पे ट’ ईजाद क है!
क पल दे व ने चार सौ वकेट का अपना
रकाड क़ायम कया है।
ख़बर है क डायना और चा स अब, समस
से पहले अलग हो रहे ह।
करोशा और सलवा नया भी अलग होने ही
के लये लड़ रहे ह।
ला टक पे दस फ़ सद टै स फर बढ़ गया है।
ये पहली नव बर क ख़बर ह सारी,—
नज़ाम-जहाँ इस तरह चल रहा है!
मगर ये ख़बर तो कह भी नह है,
क तुम मुझसे नाराज़ बैठ ई हो—
नज़ाम-जहाँ कस तरह चल रहा है?

बौछार
म कुछ कुछ भूलता जाता ँ अब तुझको,
तेरा चेहरा भी धुँधलाने लगा है अब तख़ युल म,
बदलने लग गया है अब वह सुब-हो-शाम का
मामूल, जसम
तुझसे मलने का भी इक मामूल शा मल था!
तेरे ख़त आते रहते थे तो मुझको याद रहते थे
तेरी आवाज़ के सुर भी!
तेरी आवाज़ को काग़ज़ पे रख के, मैने चाहा
था क ‘ पन’ कर लू,ँ
वो जैसे तत लय के पर लगा लेता है कोई
अपनी अलबम म—!
तेरा ‘बे’ को दबा कर बात करना,
“वाव” पर होठ का छ ला गोल हो कर घूम
जाता था—!
ब त दन हो गये दे खा नह , ना ख़त मला कोई—
ब त दन हो गये स ची!!
तेरी आवाज़ क बौछार म भीगा नह ँ म!

इक न म
ये राह ब त आसान नह ,
जस राह पे हाथ छु ड़ा कर तुम
यूं तन त हा चल नकली हो
इस ख़ौफ़ से शायद राह भटक जाओ न कह
हर मोड़ पे मैने न म खड़ी कर रखी है!
थक जाओ अगर——
और तुमको ज़ रत पड़ जाये,
इक न म क ऊँगली थाम के वापस आ जाना!

अगर ऐसा भी हो सकता…
अगर ऐसा भी हो सकता——
तु हारी न द म, सब वाब अपने मु त क़ल कर के,
तु ह वो सब दखा सकता, जो म वाब म
अ सर दे खा करता ँ—!
ये हो सकता अगर मुम कन—
तु ह मालूम हो जाता,—
तु ह म ले गया था सरहद के पार “द ना1” म।
तु ह वो घर दखाया था, जहाँ पैदा आ था म,
जहाँ छत पर लगा स रय का जंगला धूप से दन भर
मैरे आँगन म शतरंजी बनाता था, मटाता था—!
दखायी थ तु ह वो खे तयाँ सरस क “द ना”
म क जस के पीले-पीले फूल तुमको
ख़ाब म क चे खलाये थे।
वह इक रा ता था, “टह लय ” का, जस पे
मील तक पड़ा करते थे झूले, स धे सावन के—
उसी क स धी ख़ु बू से, महक उठती ह आँख
जब कभी उस वाब से गुज़ ं ।
तु ह ‘रोहतास‘2 का ‘चलता-कुआँ” भी तो
दखाया था,
क़ले म बंद रहता था जो दन भर, रात को
गाँव म आ जाता था, कहते ह,
तु ह “काला3” से “कालूवाल4” तक ले कर
उड़ा ँ म
तु ह “द रया-ए-झेलम” पर अजब म ज़र दखाये थे
जहाँ तरबूज़ पे लेटे ये तैराक लड़के बहते रहते थे-जहाँ तगड़े से इक सरदार क पगड़ी पकड़ कर म,
नहाता, डु ब कयाँ लेता, मगर जब ग़ोता आ

जाता तो मेरी न द खुल जाती!!
मगर ये सफ़ वाब ही म मुम कन है
वहां जाने म अब शवा रयाँ ह कुछ सयासत क ।
वतन अब भी वही है, पर नह है मु क अब मेरा
वहाँ जाना हो अब तो दो-दो सरकार के
दसीय द तर से
श ल पर लगवा के मोहर वाब सा बत
करने पड़ते है।।

1. शायर का पैदाइशी क़सबा, ज़ला झेलम (पंजाब, पा क तान)
2,3,4-ये सब ज़ला झेलम के मा फ़ मक़ामात ह

नसी

न शाह के लए

इक अदाकार ं म!
म अदाकार ं ना
जीनी पड़ती ह कई ज़ द गयां एक हयाती म मुझे!
मेरा करदार बदल जाता है, हर रोज़ ही सेट पर
मेरे हालात बदल जाते ह
मेरा चेहरा भी बदल जाता है,
अफ़साना-ओ-मंज़र के मुता बक़
मेरी आदात बदल जाती ह।
और फर दाग़ नह छू टते पहनी ई पोशाक के
ख़ ता करदार का कुछ चूरा सा रह जाता है तह म
कोई नुक ला सा करदार गुज़रता है रग से
तो ख़राश के नशाँ दे र तलक रहते ह दल पर
ज़ दगी से ये उठाए ए करदार
याली भी नही’ ह
क उतर जाएँ वो पंखे क हवा से
याही रह जाती है सीने म,
अद ब के लखे जुमल क
सीम परदे पे लखी
सांस लेती ई तहरीर नज़र आता ँ
म अदाकार ँ ले कन
सफ़ अदाकार नह
व त क त वीर भी ं!!

कोहसार
नुचे छ ले गये कोहसार ने को शश तो क
गरते ये इक पेड़ को रोके,
मगर कुछ लोग कंध पर उठा कर उसको
पगडंडी के र ते ले गये थे-कारख़ाने म!
फ़लक को दे खता ही रह गया पथराई आँख से!
ब त नोची है मेरी खाल इ साँ ने,
ब त छ ले ह मेरे सर से जंगल उसके तेश ने,
मेरे द रया ,
मेरे आबशार को ब त नंगा कया है,
इस हवस आलूद-इ साँ ने—!
मेरा सीना तो फट जाता है लावे से,
मगर इ सान का सीना नह फटता—
वह प थर है!!

रात
मेरी दहलीज़ पर बैठ यी ज़ानो पे सर रखे
ये शब अफ़सोस करने आयी है क मेरे घर पे
आज ही जो मर गया है दन
वह दन हमज़ाद था उसका!
वह आयी है क मेरे घर म उसको द न कर के,
इक द या दहलीज़ पे रख कर,
नशानी छोड़ दे क मह्व है ये क़ ,
इसम सरा आकर नह लेटे!
म शब को कैसे बतलाऊँ,
ब त से दन मेरे आँगन म यूँ आधे अधूरे से
कफ़न ओढ़े पड़े ह कतने साल से,
ज ह म आज तक दफ़ना नह पाया!!

वारदात
दो बजने म आठ मनट थे—
जब वह भारी बो रय जैसी टाँग से ब डंग
क छत पर प ँचा था
थोड़ी दे र को छत के फ़श पे बैठ गया था
छत पर एक कबाड़ी घर था,
सूखा सुकड़ा त ले वाला, सूद नचोडू जागीरे
का जूता वो पहचानता था,
इस ब डंग म जसका जो सामान मरा, बेकार
आ, वो ऊपर ला के फक गया!
उसके पास तो कतना कुछ था,—
कतना कुछ जो टू ट चुका है, टू ट रहा है—
शौहर और वतन क छोड़ी हमशीरा कल पा क तान
से ब चे लेकर लौट आयी है!
सब के सब कुछ ख़ाली बोतल ड ब जैसे लगते ह,
च बे, पचके, बन लेबल के!
सुबह भी दे खा तो बूढ़ दाद सोयी यी थी,—
मरी नह थी!
जब दोपहर को, पानी पी कर, छत पर आया था
वो तब भी,
मरी नह थी, सोयी यी थी!
जी चाहा उसको भी ला कर छत पे फक दे ,
जैसे टू टे एक पलंग क पु त पड़ी है!
र कसी घ ड़याल ने साढ़े चार बजाये,
दो बजने म आठ मनट थे, जब वो छत पर आया था!
सी ढ़याँ चढ़ते चढ़ते उसने सोच लया था,

जब उस पार “ ै फ़क लाइट” बदलेगी
क जायगी सारी कार,
तब वो पानी क टं क के ऊपर चढ़ के, “पैरापेट” पर
उतरेगा, और—
चौदहव मं ज़ल से कूदे गा!
उसके बाद अँधेरे का इक वक़फ़ा होगा!
या वो गरते गरते आँख बंद कर लेगा?
या आँख कुछ और य़ादा फट जायगी?
या बस—सब कुछ बुझ जायेगा?
गरते गरते भी उसने लोग का इक कोहराम सुना!
और ल के छ ट, उड़ कर पोपट क कान
के ऊपर तक जाते भी दे ख लये थे!
रात का एक बजा था जब वह सी ढ़य से
फर नीचे उतरा,
और दे खा फ़टपाथ पे आ कर,
‘चॉक’ से ख चा, लाश का न शा वह पड़ा था,
जसको उसने छत के एक कबाड़ी घर से फका था—!!

खुश आमदे द
और अचानक——
तेज़ हवा के झ के ने कमरे म आ कर
हलचल कर द —
पद ने लहरा के मेज़ पे रखी ढे र सी काँच क
चीज़ उ ट कर द —
फड़ फड़ कर के एक कताब ने ज द से
मुँह ढांप लया—
एक दवात ने ग़ोता खा के,
सामने रखे जतने कोरे काग़ज़ थे सबको रंग डाला—!
द वार पर लटक त वीर ने भी हैरत से
गदन तरछ कर के दे खा तुमको!
फर से आना ऐसे ही तुम
और भर जाना कमरे म

स ाथ क वापसी
“क पल अव तू” र नह है,
क पल नगर के बाहर जंगल, कुछ छदरा
छदरा लगता है!
या ल ग ने सूखने से पहले ही काट दये ह पेड़,
या शाख़ ही ज द उतर जाती ह अब इन पेड़ क ?
क पल नगर से बाहर जाते उस क चे र ते से
आ ख़र कौन गया है,
र ता अब तक हाँप रहा है!
उस मट् ट क तह के नीचे,
मेरे रथ के प हय क पुरशोर खर च,—
उन राह को याद तो ह गी—
बु म शरणम ग छा म का जाप मुसलसल जारी है,
“आन दन”— और “राघव” के ह ठ पर
जो मेरे साथ चले आये ह!
उनके होने से मन म कुछ साहस भी है—
‘साहस’ और ‘डर’ एक ही साँस के सुर ह दोन —
आरोही, अवरोही, जैसे चलते ह—
और ‘अना’ ये मेरी क म रहबर ँ—
यागी भी ँ—
राजपाट का याग कया है,
प नी और संतान के होते ….
या ये भी इक ‘अना’ है मेरी?
या चेहरे पर जड़ा आ ये,
दो आँख का एक तराजू—
या खोया, या पाया, तौलता, रहता है—।

शहर क सीमा पर आते ही, साँस क लय म
फ़क़ आया है—
पजरे म इक बेचैनी ने पर फड़के ह!
जाते व त ये पगडंड़ी तो,
बाहर क जा नब उठ उठ कर दे खा करती थी!
लौटते व त ये पाँव पकड़ के,
घर क जा नब य मुड़ती है?
मै स ाथ था,
जब इस बरगद के नीचे चोला बदला था,
बारह साल म कतना फैल गया है घेरा इस बरगद का,
क़द भी अब ऊँचा लगता है,—
‘रा ल‘1 का क़द या मेरी ना भ तक होगा?
मुझ पर है तो कान भी उसके ल बे ह गे—
माँ ने छदवाये ह शायद—
रंग और आँख, लगता था माँ से पायी ह।
राज कुँवर है, घोड़ा दौड़ाता होगा अब,
‘यश’ या रथ पर जाने दे ती होगी उसको?
बु म शरणम ग छा म, और बु म शरणम ग छा म—
ये जाप मुसलसल सुनते सुनते,
अब लगता है जैसे मंतर नह , चेतावनी है ये—
“मु राह” से बाहर आना,—
अब उतना ही मु कल है, जतना संसार से
बाहर जाना मु कल था!!
य लौटा —
ँ —?
या था जो म छोड़ गयो था—
कौन सा छाज बखेर गया था,
और बटोरने आया ँ म—
उठते उठते शायद मेरी झोली से,
स ब ध भरा इक थाल गरा था—
गूँज ई थी, ले कन म ही वो आवाज़
फलाँग आया था—

हर स ब ध बँधा होता है,
दोन सर से,
एक सरा तो खोल गया था,
सरा खुलवाना बाक़ था—
शायद उस मन क गरह को, खोलने
लौट के आया ँ म!
आगे पीछ चलते मेरे चेल क आवाज़
कहती रहती ह,
महसूर हो तुम, तुम क़ैद हो, उस “ ान मं ” के,
जो तुमने ख़ुद ही ा त कया है—
बु म शरणम ग छा म— और बु म शरणम ग छा म!!

1. गौतम बु

का बेटा

राख
सलाख़ के पीछे पड़े इ क़लाबी क आँख म भी
राख उतरने लगी है।
दहकता आ कोयला दे र तक जब ना
फूँका गया हो,
तो शोले क आँख म भी
मो तये क सफ़ेद उतर आती है!

-खुदकुशी
बस इक ल हे का झगड़ा था——
दरोद वार पे ऐसे छनाके से गरी आवाज़ जैसे
काँच गरता है।
हर इक शय म गय उड़ती यी, जलती यी कच!
नज़र म, बात म, लहजे म,
सोच और साँस के अ दर।
ल होना था इक र ते का, सो वह हो गया
उस दन—!
उसी आवाज़ के टु कड़े उठा के फ़श से उस शब,
कसी ने काट ल न ज़——
ज़रा आवाज़ तक ना क ,
क कोई जाग ना जाये!!

वाद -ए-क मीर
सलीम आ रफ़ के नाम
बड़ी उदास है वाद
गला दबाया आ है कसी ने उंगली से
ये सांस लेती रहे, पर ये सांस ले न सके!
दर त उगते ह कुछ सोच सोच कर जैसे
जो सर उठाएगा पहले वही क़लम होगा
झुका के गदन आते ह अ , ना दम ह
क धोए जाते नह ख़ून के नशाँ उन से!
हरी हरी है, मगर घास अब हरी भी नह
जहां पे गो लयां बरस , ज़म भरी भी नह
वो ‘माई ेटरी’ पंछ जो आया करते थे
वो सारे ज़ मी हवा से डर के लौट गए
बड़ी उदास है वाद —— ये वाद -ए-क मीर!

रात तामीर कर
इक रात चलो तामीर कर,
ख़ामोशी के संग-े मरमर पर,
हम तान के तारीक सर पर,
दो शम’एं जलाये ज म क !
जब ओस, दबे पाँव उतरे
आहट भी ना पाये साँस क ,
कोहरे क रेशमी ख़ुशबू म,
ख़ुशबू क तरह ही लपटे रह
और ज म के स धे पद म
ह क तरह लहराते रह!!

ज़मीन पर पड़ाव
“दायरे क असीरी” (अहमद नद म क़ासमी) ने ब त मुताअ सर कया था। उस का एक
सुबूत, जनाब स यपाल आन द क न म से मला “आ मानी एलची से एक
मुकालमा”-“दायरे क असीरी” ने ज़हन म कई सवाल खड़े कर दये!
-----------इतक़ा क कौन सी म ज़ल है ये?
जु तजू क कौन सी हद है?
“ ै वट ” क , क़रन क असीरी खोल कर बाहर
नकलने क सई
सफ़ पहली बार इस सतहे-ज़म से एड़ीयां
उचक ह हमने
बाक़ नया क मख़लूक़ात से वा क़फ़ ही कब थे
बाक़ मख़लूक़ात का अ दाज़ा हो तो आगे सोच
कब कहा था उसने, मख़लूक़ात म अशरफ़ ह हम
या कसी को याद है, वो कस जगह
हम से मला था?
वो कोई आवाज़ थी, या बस अलामत थी कोई,
जसक क—
हमने ख़ुद ही इक तशरीह कर डाली!
क हम अपनी ही हैरत को ख़ुदा का नाम
दे कर जी रह ह!
काएनात इक बेकराँ काला सम दर
काएनात इक गहरा और अ धा कुआँ,
और उस म गदन डाल कर आवाज़ दे ते जा रह ह
और जो सुनते ह, वो लौट ई अपनी सदा है
अपनी ही आवाज़ से मस र लगते है

सृ ी के सभी असरार खुलते जा रहे ह
और गरती जा रही ह चादर अफ़लाक क
और जु तजू का ये सफ़र तो अब शु होने लगा है
हर कदम क़रन म उठता है यहां
इतक़ा क इबतदाई म ज़ल ह!
ये पड़ाव है ज़म पर
न ल भी ये इबतदाई है
ज म ये झड़ते रहगे
जस तरह पेड़ से प े
सफ़ इक क़तरा ‘इनज ’ का बलआ ख़र
नूर क इक बूंद ले कर
व ते काएनात तक जाना है हम को!

केच
याद है इक दन——
मेरे मेज़ पे बैठे बैठे,
सगरेट क ड बया पर तुमने,
छोटे से इक पौधे का,
एक केच बनाया था——!
आकर दे खो,
उस पौधे पर फूल आया है!

एक मंज़र….
ये म ज़र पहले दे खा है!
फ़ौज क फ़ौज खड़ी है जम कर
ब क ताने कंध पर
और जूम इक लोग का, बाह लहराता
शायद उ ीस सौ उ ीस और अमृतसर है,
ज लयाँवाला बाग़ से मलता जुलता है,
या उ ीस सौ छ ीस म लाहौर का म ज़र,
तहरीके आज़ाद के उस सालाना जलसे के फ़ौरन
बाद का दन है!
इस तसवीर म कतना कुछ जाना पहचाना सा
लगता है,
इन लोग के चेहरे भी पहचाने से ह,
इन चेहर पर मायूसी और गु से क तहरीर भी,
इनक उ , इनके ज बे,
म उन सब से वा क़फ़ ँ!
हो सकता है, सन् उ ीस सौ बयालीस था,
और इलाहाबाद था
चौक के बीच बीच बने इस गोल जज़ीरे के जंगले म,
फ़ौज क फ़ौज खड़ी थी जम कर,
दायरा ख चे, ब क़ ताने कंध पर,
और जूम इक लोग का, बाँहे लहराता
ब ली ब ली हाथ उछलते ए हवा म,
मु ठ् ठयाँ भ चे,
लोग के हाथ म तब भी
ऐसा ही इक झंडा था—

नार क आवाज़ यही थी,
इसी तरह से चली थी गोली,
इसी तरह कुछ लोग मरे थे,
और सड़क पर ख़ून बहा था—!
चौक के बीच बीच मगर,
उस लोहे के जंगले के अ दर,
इक अं ेज़ का बुत था पहले,
अब, गाँधी क मूत है।
ले कन अब तो——
सन् उ ीस सौ बानवे है!!

कु लू वाद
बादल म कुछ उड़ती ई भेड़ नज़र आती ह
बे दखते ह कभी भालु से कु ती लड़ते
ढ ली सी पगड़ी म इक बुड्ढा मुझे दे ख के
हैरान सा है
कोई गुज़रा है वहां से शायद
धूप म डू बा आ श लेकर
बफ़ पर रंग छड़कता आ- जस के क़तरे
पेड़ क शाख़ पे भी जाके गरे ह
दौड़ के आती है बेचैन हवा झाड़ने रंगीन छ टे
ऊंचे, जाट क तरह सफ़ म खड़े पेड़ हला दे ती है
और इक धुंधले से कोहरे म कभी
मोटर नीचे उतरती ह पहाड़ से तो लगता है
चादर पहने ए, दो दो सफ़ म
पादरी शमाएँ जलाए ए जाते ह इबादत के लए
कु लू क वाद म हर रोज़ यही होता है
शाम होते ही उतर आता है बादल नीचे
ओढ़नी डाल के म ज़र पे, मुनाद करने
आज दन भर क नुमाइश थी, यह ख़ म ई!

ख़ाली सम दर
उसे फर लौट कर जाना है, ये मालूम था उस
व त भी जब शाम क —
सुख़ सुनहरी रेत पर वह दौड़ती आयी थी,
और लहरा के—
यूँ आग़ोश म बखरी थी जैसे पूरे का पूरा
सम दर-ले के उमड़ी है,
उसे जाना है वो भी जानती तो थी,
मगर हर रात फर भी हाथ रख कर चाँद पर
खाते रहे क़सम,
ना म उत ँ गा अब साँस के सा हल से,
ना वह उतरेगी मेरे आसमाँ पर झूलते तार
क प ग से
मगर जब कहते कहते दा ताँ, फर व त ने
ल बी ज हाई ली,
ना वह ठहरी—
ना म ही रोक पाया था!
ब त फूँका सुलगते चाँद को, फर भी उसे
इक इक कला घटते ये दे खा
ब त ख चा सम दर को मगर सा हल तलक
हम ला नह पाये,
सहर के व त फर उतरे ये सा हल पे
इक डू बा आ ख़ाली सम दर था!!

स ज़ ल हे
सफ़ेदा चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है
पहाड़ को सुनाती है
पुरानी दा तान पछले पेड़ क —!
वहाँ दे वदार का इक ऊँचे क़द का, पेड़ था पहले
वो बादल बाँध लेता था कभी पगड़ी क सूरत
अपने प पर,
कभी दोशाले क सूरत उसी को ओढ़ लेता था—
हवा क थाम कर बाँह—
कभी जब झूमता था, उससे कहता था,
मेरे पाँव अगर जकड़े नह होते,
म तेरे साथ ही चलता——!
उधर शीशम था, क कर से कुछ आगे,
ब त लड़ते थे वह दोन —
मगर सच है क क कर उसके ऊँचे
क़द से जलता था—
सुरीली सी टयाँ बजती थ जब शीशम के प म,
प र दे बैठ कर शाख़ पे, उसक नक़ल करते थे—
वहाँ इक आम भी था,
जस पे इक कोयल कई बरस तलक आती रही—
जब बौर आता था—
उधर दो तीन थे जो गुलमोहर, अब एक बाक़ है,
वह अपने ज म पर खोदे ये नाम को ही
सहलाता रहता है—
उधर इक नीम था
जो चाँदनी से इ क़ करता था—
नशे म नीली पड़ जाती थ सारी प याँ उसक ।

ज़रा और उस तरफ़ परली पहाड़ी पर,
ब त से झाड़ थे जो ल बी ल बी साँस लेते थे,
मगर अब एक भी दखता नह है, उस पहाड़ी पर!
कभी दे खा नह , सुनते ह, उस वाद के दामन म,
बड़े बरगद के घेरे से बड़ी इक च पा रहती थी,
जहाँ से काट ले कोई, वह से ध बहता था,
कई टु कड़ म बेचारी गयी थी अपने जंगल से—!
सफ़ेदा चील इक सूखे ए से पेड़ पर बैठ
पहाड़ को सुनाती है पुरानी दा तान ऊँचे पेड़ क ,
ज ह इस प त क़द इ साँ ने काटा है, गराया है,
कई टु कड़े कये ह और जलाया है!!

म सया
या लये जाते हो तुम कंध पे यारो
इस जनाजे म तो कोई भी नह है,
दद है कोई, ना हसरत है, ना गम है—
मु कराहट क अलामत है ना कोई आह का नु ता
और नगाह क कोई तहरीर ना आवाज़ का क़तरा
क म या द न करने जा रहे हो?
सफ मट् ट है ये मट् ट ——
मट् ट को मट् ट म दफ़नाते ये
रोते हो य ?

अमजद ख़ान
वो दो त कल गुज़र गया
वो दो त अब नह रहा
ग़ बे-आफ़ताब के
सुनहरी पेड़ के तले
जहाँ वो रोज़ मलता था
वह पे द न कर दया!
म नीम अँधेरी क़ म
सुला रहा था जब उसे
तो नीम वा नगाह से
वो दे खता रहा मुझे!
हथे लय से आँख के
चराग़ भी बुझा दये
क दो जहाँ के सल सले
ज़म पे ही चुका दये!
जब वहाँ से लौटा तो
वो साथ साथ आ गया
वो दो त जो नह रहा
वो दो त कल गुज़र गया

शायर
वो पुल क सातव सीढ़ पे बैठा कहता रहता था
कसी थैले म भर के गर याल अपने
म दरवाज पे हरकारे क सूरत जा के प ँचाता,
चमकती बूँद बा रश क , कसी क जेब म भर के,
गले म बादल का एक मफ़लर डाल के आता,
वह भीगा भीगा सा रहता—!
कसी के कान म दो बा लय से चाँद पहनाता,
मछे र क कोई लड़क अगर मलती—
गरजते बादल को बाँध कर बाल के जूड़े म,
धनक क वेणी दे आता—
मुझे गर कहकशाँ को बाँटने का हक़ दया होता,
खुदा ने तो…
कोई फ़टपाथ से बोला:
“अबे औलाद शायर क ——
ब त खायी ह खी रो टयाँ मने
जो ला सकता है तो
इक बार कुछ सालन ही ला कर दे !”

माज़ी-मु तक़ बल
गेट के अ दर जाते ही इक हौज़ ख़ास है
सकड़ क स क काई से भरा आ है—
चार जा नब छ: सौ साल पुराने साये सूख रहे ह—
गुज़रे व त क तमसील पर
गाईड वक़ लगा के माज़ी बेच रहा है।
माज़ी के उस गेट के बाहर
हाथ क रेखाय रख के पटरी पर,
पंचांग का यो तषी कोई,
मु तक़ बल क पु ड़याँ बाँध के बेच रहा है—

हवामहल जयपुर
पीछे , शाम के ह द रंग आकाश क चादर
सामने बजली के दो ल बे तार खचे ह,
उन पर काले काले पंछ ——
ऐसे यान लगाये बैठे रहते ह
जैसे कोई ह द के अ र ला कर, रख जाता है!
शाम पड़े ही,
रोज़ाना कोई राज क व इन तार पर,
इक दोहा लख जाता है!

ख़च
मुझे ख़च म पूरा एक दन, हर रोज़ मलता है
मगर हर रोज़ कोई छ न लेता है,
झपट लेता है, अंट से!
कभी खीसे से गर पड़ता है तो गरने क
आहट भी नह होती,
खरे दन को भी म खोटा समझ के भूल जाता ं!—
गरेबाँ से पकड़ के माँगने वाले भी मलते ह!
“तरी गुज़री यी पु त का क़ज़ा है,
तुझे क़ त चुकानी ह-”
ज़बरद ती कोई गरवी भी रख लेता है, ये कह कर,
अभी दो चार ल हे ख़च करने के लये रख ले,
बक़ाया उ के खाते म लख दे ते ह,
जब होगा, हसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दन इक बार म
अपने लये रख लू,ँ
तु हारे साथ पूरा एक दन बस ख़च
करने क तम ा है!!

गु तगू
कभी कभी, जब म बैठ जाता ं अपनी न म
के सामने न फ़ दायरे म
मज़ाज पूछूं
क एक शायर के साथ कटती है कस तरह से?
वो घूर के दे खती ह मुझ को
सवाल करती ह! उन से म ं?
या मुझ से ह वो?
वो सारी न म, क म समझता ं वह मेरे
“जीन” से ह ले कन
वो यूं समझती ह उन से है मेरा नाक न शा
ये श ल उन से मली है मुझ को!
मज़ाज पूछूं म या? क इक न म आगे आती है
छू के पेशानी पूछती है!
“बताओ गर इनतशार है कोई सोच म तो?
मै पास बैठं ू ?
मदद क ं और बीन ं उलझन तु हारी?”
‘उदास लगते हो,’ एक कहती है पास आकर
“जो कह नह सकते तुम कसी को
तो मेरे कान म डाल दो राज़ अपनी
सरगो शय के, ले कन,
गर इक सुनेगा, तो सब सुनगे!”
भड़क के कहती है एक नाराज़ न म मुझ से
“म कब तक अपने गले म लूंगी तु हरी
आवाज़ क ख़राश?”
इक और छोट से न म कहती है
“पहले भी कह चुक ं शायर,
चढ़ान चढ़ते अगर तेरी सांस फूल जाए
तो मेरे कंध पे रख दे कुछ बोझ म उठालूं”

वो चूप सी इक न म पीछे बैठ जो टकटक बांधे
दे खती रहती है मुझ-े बस,
ना जाने या है क उसक आंख का रंग
तुम पर चला गया है
अलग अलग ह मज़ाज सब के
मगर कह न कह वो सारे मज़ाज मुझ म बसे ए ह
म उन से ं या….
मुझे ये एहसास हो रहा ह
जब उन को त लीक़ दे रहा था
वो मुझ को त लीक़ दे रही थ !!

जंगल
है स धी तुश सी ख़ु बू धुएँ म,
अभी काट है जंगल से,
कसी ने गीली सी लकड़ी जलायी है!
तु हारे ज म से सरस ज़ गीले पेड़ क
ख़ु बू नकलती है!
घनेरे काले जंगल म,
कसी द रया क आहट सुन रहा ँ म,
कोई चुपचाप चोरी से नकल के जा रहा है!
कभी तुम न द म करवट बदलती हो तो
बल पड़ता है द रया म!
तु हारी आँख म पर ाज दखती है प र द क
तु हारे क़द से अ सर आबशार के हस क़द याद है!

टोबा टे क सह
मुझे वाघा पे टोबा टे क सह वाले ‘ बशन’ से
जा के मलना है
सुना है वो अभी तक सूजे पैर पर खड़ा है
जस जगह ‘म टो’ ने छोड़ा था
वह अब तक बड़बड़ाता है
‘उ पर द गुड़ गुड़ द मुंग द दाल द लालटे न….’
पता लेना है उस पागल का
ऊंची डाल पर चढ़ कर जो कहता था
ख़ुदा है वो
उसी को फ़ैसला करना है
कस का गांव कस ह से म जाएगा
वो कब उतरेगा अपनी डाल से
उस को बताना है
अभी कुछ और भी दल ह
क जन को बांटने का, काटने का काम जारी है
वो बटवारा तो पहला था
अभी कुछ और बटवारे भी, बाक़ ह!!
मुझे वाघा पे टोबा टे क सह वाले बशन से
जाके मलना है
ख़बर दे नी है उस के दो त ‘अफ़ज़ल’ को
वह ‘लहना सह’, ‘वघावा सह’ वो ‘भैन अमृत’
जो सारे क़ ल होकर इस तरफ़ आए थे
उनक गदन सामान ही म
लुट ग पीछे
ज़बह करदे वह “भूरी”, अब कोई लेने न आएगा
वो लड़क एक उंगली जो बड़ी होती थी हर

बारह महीन म
वो अब हर इक बरस इक पोटा पोटा
घटती रहती है
बताना है क सब पागल अभी प ंचे नह
अपने ठकान पर
ब त से इस तरफ़ ह, और ब त से उस
तरफ़ भी ह
मुझे वाघा पे टोबा टे क सह वाला बशन अ सर
यही कह के बुलाता है
‘उ पर द गुड़ गुड़ द मुंग दाल द लालटे न,—
द ह तान ते पा क तान द र फट मुंह!!

दोनो
दे र तक बैठे ये दोन ने बा रश दे खी!
वो दखाती थी मुझे बजली के तार पे
लटकती यी बूँद
जो तआक़ब म थ इक सरे के!
और इक सरे को छू ते ही तार से टपक जाती थ !
मुझको ये फ़ क बजली का करंट
छू गया नंगी कसी तार को तो आग लगा दे ने
का बाइस होगी!
उसने काग़ज़ क कई क तयाँ पानी म उतार ,
और ये कह के बहा द क सम दर म मलगे,
मुझको ये फ़ क इस बार भी सैलाब का पानी,
कूद के उतरेगा कोहसार से जब,
तोड़ के ले जायेगा यह क चे कनारे!
ओक म भर के वो बरसात का पानी,
अधभरी झील को तरसाती रही——
वो ब त छोट थी, कम सन थी,
वो मासूम ब त थी—
आबशार के तर ुम पे क़दम रखती थी और
गूँजती थी।
और म उ के अफ़कार म गुम—
तजुरबे हमराह लये
साथ ही साथ म बहता आ, चलता आ,
बहता गया—!!

वही गली थी…
म अपने बज़नेस के सल सले म,
कभी कभी उसके शहर जाता ँ तो गुज़रता ँ
उस गली से।
वो नीम तारीक सी गली,
और उसी के नु कड़ पे ऊँघता सा
पुराना इक रौशनी का ख बा,
उसी के नीचे तमाम शब इंतज़ार कर के,
म छोड़ आया था शहर उसका!
ब त ही ख़ ता सी रौशनी क छड़ी को टे के,
वो ख बा अब भी वह खड़ा है!!
फ़तूर है यह, मगर म ख बे के पास जा कर,
नज़र बचा के मोह ले वाल क ,
पूछ लेता ँ आज भी ये—
वो मेरे जाने के बाद भी, आयी तो नह थी?
वह आयी थी या?

द ना म—
बड़ी सी एक लड़क थी,—
मेरा ब ता पकड़ के, और दरवाज़े के पीछे
ख च कर मुझको,
मेरे ब ते से उसने ‘गाचनी’ मट् ट चुरायी थी,
कुतर के दाँत से वो मु कुरायी थी।
मेरे गाल पे ‘प पी’ ले के बोली थी,
“मुझे दे दे ये मट् ट ,
मुझको त ती पोत कर इक नाम लखना है।”
“वो कोई हा मला होगी” मुझे माँ ने बताया था
म शायद छ: बरस का था!
म अब छ पन बरस का —
ँ
म अब भी हा मला ँ याद से उसक ,
वो लड़क अब भी मुझको याद आती है!!

यु
द वार के बीच बीच जड़ी इक चौरस खड़क ,
चौरस इक आकाश का टु कड़ा थाम के
बैठ रहती है।
इतने से आकाश के ‘सीम पद’ पर,
दन और रात के कतने म ज़र आते ह और
जाते ह—
सुबह सुबह जब रौशनी ‘फ़ेड इन’ होती है,
और पसेम ज़र म च ड़य क आवाज़ गूँजती ह—
शाख़ पे लटका जामुनी रंग का फूल
उतरता है, ऊपर से,
झूल झूल के, करतब दखला के फर
ऊपर उठ जाता है।
और कभी उस शाख़ पे इक बादामी च ड़या,
फूल के साथ नज़र आती है पद पर,
दोन म कुछ है, लगता है—
याहे, याहे से लगते ह।
जब म ज़र त द ल होता है,
ऊँचे-ऊँचे शमल वाले ‘गभ ’ बादल,
काले-काले घ ड़ के रथ दौड़ाते ह।
लगता है सब रणभू म क ओर चले ह।
नेज़े भाले, तलवार के टकराने से बजली
क धती रहती है,
फर यु का मंज़र छट जाता है,
सुख़ ल भी स री होते होते
फर काला पड़ने लगता है—
सब त वीर धुल जाती ह—!

क ती खेते-खेते फर ‘सीम पद’ पर चाँद आता है—
मालकोस क धुन पर ‘सा-मा, सा-मा, गा-सा,
गाते-गाते तारे भर जाते ह—
म ज़र तो चलता रहता है।
मेरी दोन आँख जब तक न द म डू बने लगती ह—
ह पताल के,
इक चौकोर से कमरे क द वार के बीच बीच
जड़ी इक चौरस खड़क ,
चौरस इक आकाश का टु कड़ा थामे बैठ रहती है।

व डयो
उ इक पूल पे लपट होती-या लपटती जाती,
और त वीर शबोरोज़ क महफूज़ भी हो जात
सभी, टे प के ऊपर—
म तेरे दद को दोबारा से जीने के लये,
रोज़ दोहराता उ ह, रोज़ ‘ र-वाइ ड’ करता,
वो जो बरस म जया था, उसे हर शब जीता!!

पतझड़
जब जब पतझड़ म पेड़ से पीले पीले
प े मेरे लॉन म आ कर गरते ह—
रात को छत पर जा कर म
आकाश को तकता रहता ँ—
लगता है कमज़ोर सा पीला चाँद भी शायद,
पीपल के सूखे प े सा,
लहराता लहराता मेरे लॉन म आ कर उतरेगा!!

और सम दर मर गया…
और सम दर मर गया, उस रात जस शब,
उसके सा हल से लगी चट् टान से,
कूद कर जाँ दे द उस महताब ने—
जसका चेहरा दे ख कर तूफ़ान उठते थे
सम दर म कभी,
उस के पांव क गुलाबी ए ड़य के नीचे अपनी
बल बलाती झाग के न दे बछाने के लये—
सा हल पर सर पटख़ दे ती थ लहर-लेट जाती थ
लौट कर अपने उफ़क़ पर,
ग़क़ सब लहर य ।
और सम दर मर गया उस रात जब,
उसके सा हल से लगी चट् टान से,
कूद कर जाँ दे द उस महताब ने!!

पवत
कभी पवत क ऊँची चो टय पर जब,
धुएँ जैसे घने बादल सुलगते ह,
मुझे पवत ब त बेचैन लगते ह!
हवाय पवत क , जंगल म, बैन करती
दौड़ती ह जब,
पता चलता है क पवत परेशाँ ह!
बड़े नाराज़ लगते ह वो जब अपनी चट् टान को
उठा कर ख़ंदक़ म फक दे ते ह!
ज़म हलती है जब पाँव पटख़ते ह।
उ ह अ छा नह लगता,

सुरंग खोद के सीने म उनके,
जब कोई बा द के गोले उड़ाता है!!

ये सात रंगी धनक
ये सात रंगी धनक कौन चढ़ के साफ़ करे
हज़ार जाले लगे ह, याह लगती है।
कोई उ मीद अगर उड़ के छू भी ले इस को
तो गद उड़ती है, या रंग भुरने लगते ह
फ़लक खुला था तो सोचा क धूप नकलेगी
ये ‘दाग़ दाग़ उजाला’ भी छट ही जाएगा
मगर इस आधी सद म—
पुरानी छत का सा लगता है आसमान मुझे
मरीज़ लगती है सुबह, ज़ईफ़ लगता है सूरज
दर त इतने गरे ह पुराने और घने
पर दे डरते ह शाख़ पे तनके रखते ए
अक़ दे तोड़े ह इतने यादा लोग ने
चल जो चार कदम, तलवे कटने लगते ह
म कस उ म द के पर खोलूं और उड़ाऊं उसे
ये सात रंगी धनक कौन चढ़ के साफ़ करे

दन
आज का दन जब मेरे घर म फ़ौत आ,
ज म क रंगत जगह जगह से फट यी थी—
सुख़ ख़राश रग रही थ , बाँह पर!
पलक झुलसी झुलसी सी, और चेहरा ध जी
ध जी था—
हाथ म थे कुछ चीथड़े से अख़बार के
लब पे एक शक ता सी आवाज़ थी बस!
दे ख ज़रा इन बारह चौदह घंट म या हालत
क है नया ने!

दो त
बे-यारो मददगार ही काटा था सारा दन
कुछ ख़ुद से अजनबी सा,
त हा, उदास सा,
सा हल पे दन बुझा के म, लौट आया फर वह ,
सुनसान सी सड़क के ख़ाली मकान म!
दरवाज़ा खोलते ही, मेज़ पे रखी कताब ने,
ह के से फड़फड़ा के कहा,
“दे र कर द दो त!”

बीमार याद
इक याद बड़ी बीमार थी कल,
कल सारी रात उसके माथे पर,
बफ़ से ठं डे चाँद क पट् ट रख रख कर—
इक इक बूँद दलासा दे कर,
अज़हद को शश क उसको ज़ दा रखने क !
पौ फटने से पहले ले कन—
आख़री हचक लेकर वह ख़ामोश यी!!

इक क़
इक क़ म रहता ँ—!
इस क़ क आँत ह,
इस क़ म जो कुछ भी,
ला कर दफ़नाता ँ,
ये ह म तो करती है,
मुँह बंद नह करती,
छ: फुट से ज़रा कम है,
कतना कुछ दफ़नाया,
भरती ही नह कमब त!
जस क़ म रहता ँ!!

ज़ दाँनामा
चाँद लाहौर क ग लय से गुज़र के इक शब
जेल क ऊँची फ़सील चढ़ के,
यूँ ‘कमा डो’ क तरह कूद गया था ‘सेल’ म,
कोई आहट ना यी,
पहरेदार को पता ही ना चला!
‘फ़ैज़’ से मलने गया था, ये सुना है,
‘फ़ैज़’ से कहने, कोई न म कहो,
व त क न ज़ क है!
कुछ कहो,
व त क न ज़ चले!!

चाँद समन
रोज़ आता है ये बह पया, इक प बदल कर,
रात के व त दखाता है, ‘कलाय’ अपनी,
और लुभा लेता है मासूम से लोग को अदा से!
पूरा हरजाई है, ग लय से गुज़रता है, कभी
छत से, बजाता आ सीट —
रोज़ आता है जगाता है, ब त लोग को शब भर!
आज क रात उफ़क़ से कोई,
चाँद नकले तो गर तार ही कर लो!!

ज़ेरौ स
‘ज़ेरौ स’ करा के रखी है या रात उसने?
हर रात वही न शा, और नु ते तार के—
हर रात वही तहरीर लुढ़कते ‘स यार ’ क —
असरार वही, अफ़सूँ भी वही
हर रात उ ह तार पे क़दम रख रख के
यहाँ तक आता ँ
आकाश के ‘नो टस बोड’ पे य ,
हर रोज़ वही टं ग जाती है
‘ज़ेरौ स’ करा के रखी है या रात उसने?

एक और दन
दन का क कर काट काट के कु हाड़ी से
रात का ईधन जमा कया है!
सीली लकड़ी, कड़वे धुंए से
चू हे क कुछ सांस चली है!
पेट पे रखी, चाँद क च क ,
सारी रात म पीसूंगा
सारी रात उड़ेगा फर आकाश का चूरा!
सुबह फर जंगल म जाकर
सूरज काट के लाना होगा!!

मेरे हाथ
कहां से ढूँ ढूँ म हाथ अपने,
क मेरे हाथ पे और लोग ने हाथ
अपने चढ़ा दये ह,
क मेरे आमाल भी कसी और का अमल ह!
म जो भी करता ँ और लोग क उँग लयाँ आ के
जुड़ने लगती है-उँग लय से,
जब से अपना पसीना पोछू ँ , तो ग़ैर क नाक छू
के जाता है हाथ मेरा,
अजीब है ये नज़ाम जसम,
नज़ाम ने काट कर मेरे हाथ,
क़ायद और फ़ाइल म छु पा दये ह!
कहाँ से ढूँ ढूँ म हाथ अपने,
क मेरे हाथ पे और लोग ने हाथ
अपने चढ़ा दये ह!!

मॉनसून
बा रश आती है तो पानी को भी लग जाते ह पाँव,
दरोद वार से टकरा के गुज़रता है गली से,
और उछलता है छपाक म,
कसी मैच म जीते ये लड़क क तरह!
जीत कर आते ह जब मैच गली के लड़के,
जूते पहने ये कैनवस के,
उछलते ये गद क तरह,
दरोद वार से टकरा के गुज़रते ह
वो पानी के छपाक क तरह!

फटपाथ
इस फ़टपाथ पे रहना अब मु कल है दो त,
सोचता ँ फ़टपाथ बदल लूँ
पहले सा अब शम, लहाज़ नह लोग म,
ना पहले सी नयादारी!
वो भी दन थे-आस-पड़ोस म पूछ लया करते थे
गर कोई भूखा ही सो जाए तो
अब तो जेब कट जाती ह सोते म,—
और तो और क सर के नीचे रखे, रात को
जूते भी चोरी हो जाते ह!
म जब आया था इस शहर म,
आठ आने लेता था इस पाड़े का दादा—
और अ ी ह ते क , वह वद वाला
इतनी भीड़ नह होती थी—
भखमंगे भी कम होते थे
धंधे वाले लोग थे सारे!
कोई हमाल था गोद म, पनवाड़ी कोई,
कुछ ईरानी होटल के ल डे थे, आ कर सो जाते थे—
फोकट के नारे लगवाने वाले नेता लोग नह थे
पहले के जो नेता थे नां-‘बाटा’ के जूत जैसे थे,
साल साल चला करते थे,
‘पावर’ वाले लोग थे सारे,
चुटक म मन का काँटा ख च दया
करते थे, साला—
अब तो आया और गया!
सब क चरपट् ट —!!

मेरे दन म—
औरत ज़ात ‘मुलुक’ म रख कर आते थे
मज़ री करने,
कोई बेट , बु ढ़या, साथ म आ जाती तो—
सब इ जत से दे खते थे—
कोई साला लफ़ड़ा ना था!
या कुछ होता है अब, छ छ —
अब फ़टपाथ पे रहने म भी ‘ र क’ ब त है,
जब से ह मु लम दं गे करवाने क रीत
चली है सयासत म,
पाड़ के दादा भी आ कर धम पता कर जाते ह!
कस साले को धम पता है?
याद कहाँ है?
कतने साल ये अपने को—?
जब से टाँग कट थी ए सीडे ट म साली,
क वाला इक पी के जब फ़टपाथ के ऊपर
चढ़ आया था,
मल क नौकरी छू ट गयी थी!
तब से ये बैसाखी ले कर,
झाड़न बेच क टै सी धो कर
दन कटते ह!!
छोड़ गया फ़टपाथ ये आ ख़र झुम लंगड़ा,
चौपाट के पुल से कूद के उसने अपनी
जान दे द है!

तआकब
लाख दन के बाद म जब भी तुमसे
मल कर आता ँ
पीछे पीछे आती तेरी दो आँख क चाप
सुनाई दे ती है।
कई दन तक यूँ लगता है,
म चाहे जस राह से गुज़ ँ ,
दे ख रही होगी तू मुझको!!

चाँदघर
कतना असा आ कोई उ मीद जलाये,
कतनी मुददत
्
यी कसी क़द ल पे जलती
रौशनी रखे!
चलते फरते इस सुनसान हवेली म,
त हाई से ठोकर खा के,
कतनी बार गरा ँ म।
चाँद अगर नकले तो अब इस घर म
रौशनी होती है,
वना अँधेरा रहता है!

सोना
ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो—
ज़रा मद् धम करो इस आँच को सोना
क जल जाते ह कँगुरे नम र त के!
ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो,
ब त चुभते ह जब नाराज़गी से बात करती हो!!

पो ट बॉ स
पो ट बॉ स आज भी ख़ाली ही रहा—
आ खरी ख़त को भी आये ए कुछ साल ये ह—
डा कया हँसता है
“अब कौन लखेगा तुझे चट् ठ बाबा?
मौत आयेगी तो मौला ही का ख़त लायेगी अब तो—”
वह तू ख़ुद हाथ से लखना मेरे मौला!
हचक आती है तो लगता है क द तक आयी—
ख़त नह आता कोई—
हर महीने—
फ़क़त इक बजली का बल,
पानी का नो टस,
जो बहरहाल चला आता है—

बु ढ़या रे
बु ढ़या, तेरे साथ तो मैने, जीने क हर शै बाँट है!
दाना पानी, कपड़ा ल ा, न द और जगराते सारे,
औलाद के जनने से बसने तक, और बछड़ने तक!
उ का हर ह सा बाँटा है।—
तेरे साथ जुदाई बाँट , ठ, सुलह, त हाई भी,
सारी कार ता नयाँ बाँट , झूठ भी और स चाई भी,
मेरे दद सहे ह तूने,
तेरी सारी पीड़ मेरे पोर म से गुज़री ह,
साथ जये ह—
साथ मर ये कैसे मुम कन हो सकता है?
दोन म से एक को इक दन,
जे को श शान पे छोड़ के,
त हा वापस लौटना होगा!!

व मग पूल
गम से कल रात अचानक आँख खुली तो
जी चाहा क वी मग पूल के
ठं डे पानी म इक डु बक मार के आऊँ,
बाहर आ कर वी मग पूल पे दे खा तो हैरान आ,
जाने कब से
बन पूछे इक चाँद आया और मेरे पूल म,
आँख बंद कये लेटा था, तैर रहा था!
उफ़! कल रात ब त गम थी!!

हनीमून
कल तुझे सैर करायगे सम दर से लगी गोल
सड़क क ,
रात को हार सा लगता है सम दर के गले म!
घोड़ा गाड़ी पे ब त र तलक सैर करगे
घोड़े क टाप से लगता है क कुछ दे र के
राजा ह हम!
‘गेटवे आफ़ इं डया’ पे दे खगे हम ‘ताज महल होटल’
जोड़े आते ह वलायत से हनीमून मनाने, तो
ठहरते है वह पर!
आज क रात तो फ़टपाथ पे ईट रख कर,
गम कर लेते ह बरयानी जो ईरानी के होटल
से मली है
और इस रात मना लगे हनीमून यह ज़ीने के नीचे!!

उस रात
उस रात ब त स ाटा था,
उस रात ब त ख़ामोशी थी,
साया था ना कोई सग शी, आहट थी, ना
जु बश थी कोई!
हाँ दे र तलक उस रात मगर,
बस एक मकाँ क सरी मं ज़ल पर इक रौशन
खड़क और—
इक चाँद फ़लक पर, इक जे को टकटक
बाँधे तकते रहे!

छु याँ ग मय क
बुजग के कमरे से होता आ,
सी ढ़य से गुज़र के,
दबे पांव छत पे चला आया था म—
म आया था तुमको जगाने, चलो भाग जाय,
अँधेरा है और सारा घर सो रहा है
अभी व त है, —सुबह क पहली गाड़ी का व त
हो रहा है—
अभी पछले टे शन से छू ट नह है
वहाँ से जो छू टे गी तो गाड इक ल बी सी
‘कूक’ दे गा,
इसी मुँह अँधेरे म गाँव के ‘ट .ट .’ से बचते बचाते
दोशाल क बुकल म चेहरे छु पाये,
नकल जायगे हम!
मगर तुम बड़ी मीठ सी न द म सो रही थ —
दबी सी हँसी थी लब के कनारे पे महक ई,
गले पे इक उधड़ा आ तागा कुत से नकला आ
साँस छू छू के बस कपकपाये चला जा रहा था
तब साँस क बजती यी ह क ह क
हवा जैसे सँतूर के तार पर मीढ़ लेती यी
ब त दे र तक म वह सुनता रहा
ब त दे र तक अपने होठ को आँख पे रख के—
तु हारे कसी वाब को यार करता रहा म,
नह जाग तुम-और मेरी जगाने क ह मत
नह हो सक ।
लौट आया।
सी ढ़य से उतर के,
बुजग के कमरे से होता आ।
मुझे या पता था मामूँ के धर से उसी रोज़

वह तुमको ले जायगे!!
तु ह छोड़ कर ज़ दगी इक अलग मोड़
मुड़ जायेगी।

बाबा बगलौस—
बाबा बगलौस को इन ीख़ क ‘ हसल’
नह सोने दे त
जेल ख़ामोश ह और शहर म हंगामे ह—
गम लोहे के तवे जैसी ये सड़क जन पर,
लोग दान क तरह गरते ही भुन जाते ह—
आँख , कान से मकान के, धुंआं उठता है—।
जूत क नोक पे हर रोज़ लुढ़कते ह
सर के कासे,
फ़क़ लड़ते ह सयासत म तो हर ‘गोल’ पे
इक शोर सा मच जाता है—
कोड़े लहराते ह जब ‘कैबरे डांसर’ क तरह
खाल ‘वेफ़र’ क तरह उड़ती नज़र आती है—
टाँके खुल जाय कसी मुँह के तो सी दे ती ह संगीन!
बाबा बगलौस का कहना है, शरीफ़ के लए
रहने को अब शहर नह है—
इस से बेहतर है क जेल म बुला ल उनको,—
जतने मुज रम ह उ ह जेल से बाहर कर द।।

बाबा बगलौस—2
बाबा बगलौस का तावीज़ है ये,
बाबा बगलोस क रहमत से मला है,
इसको पहनोगे तो हर ख़तरे से महफ़ज़ रहोगे
शत ये है क सदा ज म को ये छू ता रहे—
पाँव के नीचे दबे, द न ख़ज़ान क
ख़बर दे गा तु ह—
रात को त कये के नीचे रख लो—
सफ़ चालीस दन म ये बदल दे ता है क़ मत—
दल क पोशीदा तम ा क तकमील
करा दे ता है!!”
शहर के मुफ़ लसो माज़ूर ग़रीब के मुक़द्दर को
बदलने के लये,
एक फ़टपाथ पे वह बैठा आ बेच रहा था—
आठ आठ आने म कुछ मौजज़े जीने के लये!!

अमलतास
खड़क पछवाड़े क खुलती तो नज़र आता था
वह अमलतास का इक पेड़, ज़रा र
अकेला सा खड़ा था।
शाख़ पंख क तरह खोले ए,
इक प र दे क तरह।
वरग़लाते थे उसे रोज़ प र दे आ कर
जब सुनाते थे वो परवाज़ के क़ से उसको,
और दखाते थे उसे उड़ के,
क़लाबा ज़याँ खा के।
बद लयाँ छू के बताते थे, मज़े ठं डी हवा के।
आँधी का हाथ पकड़ कर शायद,
उसने कल उड़ने क को शश क थी
धे मुँह बीच सड़क जा के गरा है!!

पहाड़ क आग
लाल सुनहरी झल मल करती आग को मने,
ज द -ज द र पहाड़ी क चोट पर चढ़ते दे खा था
जैसे केसरी रंग दोशाला ओढ़े ब ो
परली वाद से माही क बोली सुनकर,
नंगे पाँव दौड़ी थी—
फर उस आग को ऊँचे-ऊँचे चीढ़ के पेड़ पर—
चढ़ते भी दे खा था,
तेज़ हवा म दे र तलक लहरा लहरा कर,
बफ़ से फूटे एक नये च मे को पास बुलाती रही,
“आ जा, मेरे लब लग जा, म यासी ँ—”
ब ो का परदे सी माही लौट आया था,
गोटे वाली लाल सुनहरी आग के पास
ना आया कोई,—
पेड़ से जब उतरी तो बुझते चेहरे पर
राख मली थी!!!

इक इमारत
इक इमारत है
है सराये शायद,
जो मेरे सर म बसी है।
सी ढ़याँ चढ़ते उतरते ये जूत क धमक
बजती है सर म
कोन खुदर म खड़े लोग क सरगो शयाँ
सुनता ँ कभी।
सा ज़श पहने ये काले लबादे सर तक,
उड़ती ह, भू तया महल म उड़ा करती ह
चमगादड़ जैस।े
इक महल है शायद!
साज़ के तार चटख़ते ह नस म
कोई खोल के आँख,
प याँ पलक क झपका के बुलाता है कसी को!
चू हे जलते ह तो महक ई “गँदम” के धुएँ म,
खड़ कयाँ खोल के कुछ चेहरे मुझे दे खते ह!
और सुनते ह जो म सोचता ँ!
एक, मट् ट का घर है
इक गली है, जो फ़क़त घूमती ही रहती है
शहर है कोई, मेरे सर म बसा है शायद!!

एक लाश
वह लाश जो चौक म पड़ी है
ना सर पे टोपी, ना जूता पैर म, जेब ख़ाली,
ना नाम है, ना पता ठकाना,
बस इक लफ़ाफ़ा मला है जसम लखा आ है:
“म इस जहाँ से गुज़र रहा था,
बड़ा क ठन था, मगर यहाँ एक रात कना,
सवाल से घुट गयी थ साँसे,
म जा रहा ँ—!”
तलाश जारी है सर से पाँव तलक क आ ख़र
मरा तो कस चीज़ से मरा है?
नशान गोली का? ज म कोई?
कसी ने मारा?
या दल का दौरा पड़ा अचानक?
या ज़हर खा के वह ज़ दगी के ख़लाफ़
कोई गला था जो दज कर गया है!
तलाश जारी है, गर मरा सम ख़ुदा से थे भी
तो गु तगू- कस ज़बान म थी
वह कौन है जसक माफ़त वह अदम गया है?
ना चोट सर पे, ना सजदे का माहताब माथे पे
कड़ा नह है कलाई म, और ना है गले म
सलीब कोई!
जलाय उस को, या द न कर द?
अदम को जाना भी इतना आसाँ नह है हमदम,
जो दे ख सकते,
क ख़त गया, पर लफ़ाफ़े क छानबीन जारी है,

और तफ़तीश हो रही है!!

फ़तहपुर सीकरी
हवाय जा लय से जब गुज़रती ह
तो कट जाती ह जाली से—
हवा के बदन से टू ट कर गरती है जब परवाज़,
तो इक चीख़ क आवाज़ होती है—
फ़तहपुर सीकरी क जा लय से आज भी अ सर
कट परवाज़ क आवाज़ आती ह!
मुक़ यद बादशाह के ससकने क सदाय
गूँजा करती ह—
कभी दारा, कभी शाहजहाँ क सस कयाँ
कान म पड़ती ह।

कचह रयां
बरामद के बाद फर बरामदे ,
बरामदे , कचह रय के गद घूमते ये बरामदे
तवाफ़ करते, काले काले च ग़ म,
जज़ा-ओ जुम के ये सारे पादरी
लये ये ह फ़ाइल म न शे जेलख़ान के,
छु पे ये ह कोड़े और फंदे फाँ सय के आसतीन म
उतर रहे ह चढ़ रहे ह
सकस के त बु म, जस तरह से
झूलते ह बाज़ीगर
घड़ौ चय पे लोग बैठे बैठे ऊँघते ये,
सर पड़े है कु सय पे मतबान क तरह
न द से भरे ए
कताब ताक़ पर लगी जुगाली कर रही ह दाँत
म फँसी दलील क
ये घेरा डाले, खोह खोह खेलते बरामदे ,
बरामदे , कचह रय के गद घूमते ये बरामदे !!

क़
क़

तान है, क़

तान

तान से गुज़रो तो आ ह ता बोलो।

क़

तान म इतना ऊँचा बोलने का
द तूर नह है—
क़ तान से गुज़रो तो पैर क आहट
मद्धम कर लो—
चलती फरती आवाज़ से मुद को
ज़हमत होती है—
सा कत मुद, सा कत रहना चाहते ह
करवट लेना मुद के अतवार नह ह।
क़
क़

तान है,
तान म ठहरो तो क़

के कतब पर न
अपनी कोहनी रख के टे क लगाना—
नाम लखे ह, और तारीख़,
बोझ पड़े तो गर पड़ते ह—
क़ तान है, क़ तान से आ ह ता
आ ह ता गुज़रो—
कोई क़ हले ना जागे,
लोग अपने अपने ज म क क़ म बस मट् ट
ओढ़े द न पड़े ह!

हवेली
उधेड़ के ज़मीन पर,
लटा दये गये हवेली के तमाम बालोपर!
छत से कल गयाँ चमकती शमा क उतार के,
मयान, तेग़, ढाल, सब—
दर के खड़ कय के क़ ज़े खोल कर,
नमूने आँजहानी द तकार के!
चला गया क म भर के दौर एक व त का!
कबाड़ी ले गये लपेट कर मकान तो मगर,
मकाँ के पीछे पा -बाग़ म लगा,
ग़ बे-आफ़ताब का सुनहरी पेड़ छोड़ कर चले गये!

लबास
मेरे कपड़ म टं गा है तेरा ख़ुशरंग लबास
घर पे धोता ँ म हर बार उसे,
और सूखा के फर से,
अपने हाथ से उसे इ ी करता ँ मगर,
इ ी करने से जाती नह शकन उसक ,
और धोने से गले शकव के चकते नह मटते!
ज़ दगी कस क़दर आसां होती
र ते गर होते लबास—
और बदल लेते क़मीज़ क तरह!

थड व ड
जस ब ती म आग लगी थी कल क रात
उस ब ती म मेरा कोई नह रहता था!
औरत, ब चे, मद कई, और उ रसीदा लोग सभी
जनके सर पे शोले और शहतीर गरे,
उनम मेरा कोई नह था—
कूल जो क चा प का था, और बनते बनते
ख़ाक आ,
जस के मलबे म वो सब कुछ द न आ,
जो उस ब ती का मु तक़ बल कहलाता था—
उस कूल म—
मेरे घर से कोई कभी पढ़ने ना गया
और ना अब जाता था,
मेरी कोई कान नह थी
मेरा कोई सामान नह था
र ही र से दे ख रहा था,
कैसे कुछ ख़ु फ़या हाथ ने जा कर
आग लगायी थी—
जब से दे खा है, ये ख़ौफ़ बसा है दल म,
मेरी ब ती भी वैसी ही एक तर क़ करती,
बढ़ती ब ती है,
और तर क़ याफ़ता कुछ लोग को ऐसी
कोई बात पसंद नह !!

दद
दद कुछ दे र ही रहता है, ब त दे र नह —!
जस तरह शाख़ से तोड़े ये इक प े का रंग
माँद पड़ जाता है कुछ रोज़ अलग शाख़ से रह कर,
शाख़ से टू ट के ये दद जीयेगा कब तक?
ख़ म हो जायेगी जब इसक रसद,
टम टमायेगा ज़रा दे र को बुझते बुझते,
और फर ल बी सी इक साँस धुय क ले कर,
ख़ म हो जायेगा, ये दद भी बुझ जायेगा—!
दद कुछ दे र ही रहता है, ब त दे र नह !!

शहद का छ ा*
रात भर ऐसे लड़ी जैसे क मन हो मेरी!
आग क लपट से झुलसाया, कभी तीर से छे दा,
ज म पर दखती ह नाख़ुन क मच ली खर च
और सीने पे मेरे दाग़ी यी दाँत क मोहर,
रात भर ऐसे लड़ी जैसे क मन हो मेरी!
भनभनाहट भी नह सुबह से घर म उसक ,
मेरे ब च म घरी बैठ है,
ममता से भरा शहद का छ ा लेकर!!

* यह न म, सं कृत के एक दोहे से मुताअ सर होकर लखी गई

रेप
ऐसा कुछ भी तो नह था, जो आ करता है
फ़ म म हमेशा!
ना तो बा रश थी, ना तूफ़ानी हवा, और ना
जंगल का समाँ,
ना कोई चाँद फ़लक पर क जुनूँ-ख़ेज़ करे।
ना कसी च मे, ना द रया क उबलती यी
फ़ानूसी सदाय
कोई मौसीक़ नह थी पसेमंज़र म क ज बात म
हैजान मचा दे !
ना वह भीगी यी बा रश म, कोई रनुमा
लड़क थी
सफ़ औरत थी, वह कमज़ोर थी वह
चार मद ने, क वो मद थे बस,
पसेद वार उसे ‘रेप’ कया!!

‘रेड’
सद मौसम म ये बफ़ ली बलाख़ेज़ हवाय,
घर क द वार मे सुराख़ ब त ह।
और हवा घुसती है सुराख से यूं सीट बजाती,
जस तरह ‘रेड’ म आते ह हवलदार तलाशी लेने
तेज़ संगीन, चुभोते ये, धमकाते ये!!

वमब डन
टे नस मैच म दे खने वाल क गदन जब दाएं
बाएं चलती है
दाएं तरफ़ म तुम को दे खा करता था!
बा रश म जब व ब डन क जाता था
इक भीगी छतरी के नीचे
रेन कोट म गमा गरम काफ़ क सांस
उठ उठ कर च मा धुंधला कर जाती थ
भाप के फ़ टर म तुम ‘वाटर पेन टग’
जैसी लगती थ !
रोज़ उसी ‘कॉफ काउ टर’ से च स
ए ड बगर’ लेकर
से टर काट तक आना
रोज़ उसी दहलीज़ पे आकर
पैर उलारते रहते थे दहलीज़ पे ले कन
दोन जानते थे दहलीज़ को पार नह कर सकते हम!
मुझ को लौट आना था ह तान म, और तुम
को अमरीका जाना था
दोन तरफ़-दो घर थे और दो सूरज थे!!

ग़ज़ल
1
फूल क तरह लब खोल कभी
ख़ु बू क ज़बाँ म बोल कभी
अलफ़ाज़ परखता रहता है—
आवाज़ हमारी तोल कभी
अनमोल नह , ले कन फर भी
पूछो तो मु त का मोल कभी
खड़क म कट है सब रात
कुछ चौरस थ , कुछ गोल कभी
यह दल भी दो त, ज़म क तरह
हो जाता है डाँवा डोल कभी

2
हवास का जहान साथ ले गया
वह सारे बादबान साथ ले गया
बताएं या, वो आफ़ताब था कोई
गया तो आसमान साथ ले गया
कताब ब द क और उठ के चल दया
तमाम दा तान साथ ले गया
वो बेपनाह यार करता था मुझे
गया तो मेरी जान साथ ले गया
म सजदे से उठा तो कोई भी न था
वो पांव के नशान साथ ले गया
सरे उधड़ गये है, सुबह-ओ-शाम के
वो मेरे दो जहान साथ ले गया

3
गुल को सुनना ज़रा तुम सदाय भेजी ह
गुल के हाथ ब त सी आय भेजी ह
जो आफ़ताब कभी भी ु ब होता नह
वो दल है मेरा उसी क शु’आय भेजी ह
तु हारी ख़ु क सी आँख भली नह लगत
वह सारी याद जो तुमको लाय भेजी ह
याह रंग, चमकती ई कनारी है
पहन लो अ छ लगगी घटाय भेजी ह
तु हारे वाब से हर शब लपट के सोते ह
सज़ाय भेज दो हम ने ख़ताय भेजी ह
अकेला प ा हवा म ब त बुल द उड़ा
ज़मी से पांव उठाओ, हवाय भेजी ह

4
आँख म जल रहा है पे बुझता नह धुआँ
उठता तो है घटा सा, बरसता नह धुआँ
पलक के ढापने से भी कता नह धुआँ
कतनी उंडेल आँख पे बुझता नह धुआँ
आँख से आँसु के मरा सम पुराने ह
महमां ये घर म आय तो चुभता नह धुआँ
चू हे नह जलाये क ब ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये ह अब उठता नह धुआँ
काली लक र ख च रहा है फ़ज़ा म
बौरा गया है कुछ भी तो खुलता नह धुआँ
आँख के प छने से लगा आग का पता
यूं चेहरा फेर लेने से छु पता नह धुआँ
चगारी इक अटक सी गई मेरे सीने म
थोड़ा सा आ के फूंक दो, उड़ता नह धुआँ

5
कुछ रोज़ से वो संजीदा है
हम से कुछ कुछ रंजीदा है
चल दल क राह से हो के चल
दलच प है और पेचीदा है
हमउ ख़ुदा होता कोई
जो है, वो उ रसीदा है
बेदार नह है कोइ भी
जो जागता है वाबीदा है
हम कस से अपनी बात कर
हर श स तेरा गरवीदा है

6
कह तो गद उड़े या कह ग़बार दखे
कह से आता आ कोई शहसवार दखे
रवां ह फर भी के ह वह पे स दय से
बड़े उदास लगे जब भी आबशार दखे
कभी तो च क के दे खे कोई हमारी तरफ़
कसी क आँख म हम को भी इंतज़ार दखे
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद, क जब हवा गुज़री
ज़म पे गरते ये फूल बेशुमार दखे
कोई त ल मी सफ़त थी जो इस जूम म वो
ये जो आँख से ओझल तो बार बार दखे

7
य ग़रीब से खेलती है रात
रोज़ इक चाँद बेलती है रात
हर तरफ़ धूल धूल उड़ती है
आ माँ जब लपेटती है रात
शम’एं सारी बुझा के जाती है
घर का मामूल जानती है रात
रंग उड़ने लगा है चेहरे से
कतनी कमज़ोर हो गयी है रात
तेरी आवाज़ घोलती है कुछ
ऐसी मद्धम सी बोलती है रात
कस म रखी है सुबह क धड़कन
ग़ चा ग़ चा टटोलती है रात
द न है चाँद कस जगह उसका
ब द क़ फरौलती है रात

8
तनका तनका कांटे तोड़े, सारी रात कटाई क
य इतनी ल बी होती है, चाँदनी रात जुदाई क
न द म कोई अपने आप से बात करता रहता है
काल कुंए म गूंजती है आवाज़ कसी सौदाई क
सीने म दल क आहट, जैसे कोई जासूस चले
हर साये का पीछा करना आदत है हरजाई क
आँख और कान म कुछ स ाटे से भर जाते ह
या तुम ने उड़ती दे खी है, रेत कभी त हाई क
तार क रौशन फसल और चाँद क एक दरांती थी
सा ने गरवी रख ली थी, मेरी रात कटाई क

9
गम लाश गर फ़सील से
आसमां भर गया है चील से
सूली चढ़ने लगी है ख़ामोशी
लोग आये ह सुन के मील से
कान मे ऐसे उतरी सरगोशी
बफ़ फसली हो जैसे ट ल से
गूंज कर ऐसे लौटती है सदा
कोई पूछे हज़ार मील से
यास भरती रही मेरे अ दर
आँख हटती नह थी झील से
लोग क धे बदल बदल के चले।
घाट प ँचे बड़े वसील से

10
एक परवाज़ दखाई द है
तेरी आवाज़ सुनाई द है
सफ़ इक सफ़हा पलट कर उसने
सारी बात क सफ़ाई द है
फर वह लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रहाई द है
जस क आँख म कट थ स दयां
उस ने स दय क जुदाई द है
ज़ दगी पर भी कोई ज़ोर नह
दल ने हर चीज़ पराई द है
आग म रात जला है या या
कतनी ख़ुशरंग दखाई द है

11
काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी
तीन थे हम, वो भी थे, और म भी था, तनहाई भी
याद क बौछार से जब पलके भीगने लगती ह
स धी स धी लगती है तब माज़ी क सवाई भी
दो दो श ल दखती ह इस बहके से आईने म
मेरे साथ चला आया है, आप का इक सौदाई भी
कतनी ज द मैली करता है पोशाक रोज़ फ़लक
सुबह को रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी
ख़ामोशी का हा सल भी इक ल बी सी ख़ामोशी थी
उन क बात सुनी भी हम ने, अपनी बात सुनाई भी
कल सा हल पर लेटे लेटे, कतनी सारी बात क
आप का कारा नह आया चाँद ने बात कराई भी

ञवेणी
1
माँ ने जस चाँद सी हन क आ द थी मुझे
आज क रात वह फ़टपाथ से दे खा मने
रात भर रोट नज़र आया है वो चाँद मुझे!
2
सारा दन बैठा, म हाथ म लेकर ख़ाली कासा
रात जो गुज़री, चाँद क कौड़ी डाल गई उसम
सूदख़ोर सूरज कल मुझसे ये भी ले जाएगा
3
आओ सारे पहन ल आईने
सारे दे खगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हस लगगे यहां!
4
हाथ मला कर दे खा, और कुछ सोच के मेरा नाम लया
जैसे ये सरवरक़ कसी नॉवल पर पहले दे खा है
र ते कुछ बस बंद कताब म ही अ छे लगते ह
5
सामने आये मेरे, दे खा मुझ,े बात भी क

मु कुराए भी, पुरानी कसी पहचान क ख़ा तर
कल का अख़बार था, बस दे ख लया, रख भी दया
6
शोला सा गुज़रता है मेरे ज म से होकर
कस लौ से उतारा है ख़ुदावंद ने तुम को!
तनक का मेरा घर है, कभी आओ तो या हो?
7
कोई चादर क तरह ख चे चला जाता है द रया
कौन सोया है तले इसके जसे ढूँ ढ़ रहे ह।
डू बने वाले को भी चैन से सोने नह दे ते!
8
सतारे चाँद क क ती म रात लाती है
सहर के आने से पहले ही बक भी जाते ह
ब त ही अ छा है

ापार इन दन शब का!
9

बस एक पानी क आवाज़ लपलपाती है
क घाट छोड़ के माँझी तमाम जा भी चुके
चलो ना चाँद क क ती म झील पार कर
10
ज़म भी उसक , ज़म क ये नेमत उसक
ये सब उसी का है, घर भी, ये घर के बंदे भी
ख़ुदा से क हये, कभी वो भी अपने घर आये!

11
इक नवाले सी नगल जाती है ये न द मुझे
रेशमी मोज़े नगल जाते ह पाँव जैसे
सुबह लगता है क ताबूत से नकला ँ अभी।
12
उ के खेल म इक तरफ़ा है ये र सा कशी
इक सर मुझ को दया होता तो इक बात भी थी।
मुझ से तगड़ा भी है और सामने आता भी नह
13
ख़फ़ा रहे वह हमेशा तो कुछ नह होता
कभी कभी जो मले आँख फूट पड़ती ह
बताएं कस को बहार म दद होता है
14
लोग मेल म भी गुम हो कर मले ह बारहा
दा तान के कसी दलच प से इक मोड़ पर
यूँ हमेशा के लये भी या बछड़ता है कोई?
15
आप क ख़ा तर अगर हम लूट भी ल आसमाँ
या मलेगा चंद चमक ले से शीशे तोड़ क!
चाँद चुभ जायेगा उंगली म तो ख़ून आ जायेगा
16
पौ फूट है और करण से काँच बजे ह

घर जाने का व त आ है, पाँच बजे ह
सारी शब घ ड़याल ने चौक दारी क है!
17
इस से पहले रात मेरे घर छापा मारे
म तनहाई ताले म बंद कर आता ँ
‘गरबा’ नाचता ँ फर घूमती सड़क पर
18
रात परेशां सड़क पर इक डोलता साया
ख बे से टकरा के गरा और फ़ौत आ
अंधेरे क नाजायज़ औलाद थी कोई-!
19
बे लगाम उड़ती ह कुछ वा हश ऐसे दल म
‘मे सीकन’ फ़ म म कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।
थान पर बाँधी नह जात सभी वा हश मुझ से।
20
तमाम सफ़हे कताब के फड़फड़ाने लगे
हवा धकेल के दरवाज़ा आ गई घर म!
कभी हवा क तरह तुम भी आया जाया करो!!
21
कभी कभी बाज़ार म यूँ भी हो जाता है
क़ मत ठ क थी, जेब म इतने दाम नह थे
ऐसे ही इक बार म तुम को हार आया था

22
वह मेरे साथ ही था र तक मगर इक दन
जो मुड़ के दे खा तो वह दो त मेरे साथ न था
फट हो जेब तो कुछ स के खो भी जाते ह।
23
वह जस से साँस का र ता बंधा आ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट द उसने
कट पतंग का मांझा मुह ले भर म लुटा!
24
कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई आया था, उ ह ले के गया, फर नह लौटे
शे फ़ से नकली कताब क जगह ख़ाली पड़ी है
25
इतनी ल बी अंगड़ाई ली लड़क ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा
छाले जैसा चांद पड़ा है उंगली पर
26
बुड़ बुड़ करते ल ज़ को चमट से पकड़ो
फको और मसल दो पैर क ऐड़ी से।
अफ़वाह को ख़ूँ पीने क आदत है।
27
ज़हरीले मछ् छर मारो, आवाज़ के

सूजन हो जाती है इन के काटे से।
मछ् छरदानी तान के जीना मु कल है।।
28
प चयाँ बँट रही ह ग लय म
अपने क़ा तल का इ तख़ाब करो
व त ये स त है चुनाव का।
29
चूड़ी के टु कड़े थे, पैर म चुभते ही ख़ूँ बह नकला
नंगे पाँव खेल रहा था, लड़का अपने आँगन म
बाप ने कल फर दा

पी के माँ क बाँह मरोड़ी थी
30

कुछ ऐसी एह तयात से नकला है चाँद फर
जैसे अंधेरी रात म खड़क पे आओ तुम।
या चाँद और ज़म म भी कोई खचाव है?
31
चाँद के माथे पर बचपन क चोट के दाग़ नज़र आते ह
रोड़े, प थर और ग़ ल से दन भर खेला करता था
ब त कहा आवारा उ का

क संगत ठ क नह —!
32

ज़मीन घूमती है गद आफ़ताब के
ज़म के गद घूमता है चाँद, रात दन
ह तीन हम, हमारी फ़ैमीली है तीन क ।

33
कुछ आफ़ताब और उड़े काएनात म
म आसमान क जटाय खोल रहा था
वह तौ लये से गीले बाल छाँट रही थी
34
जाते जाते एक बार तो कार क ब ी सुख़ ई
शायद तुम ने सोचा हो क क जाओ, या लौट आओ
स नल तोड़ के ले कन तुम इक सरी जा नब घूम गये
35
इस तेज़ धूप म भी अकेला नह था म
इक साया मेरे दोन तरफ़ दौड़ता रहा
त हा तेरे याल ने रहने नह दया!
36
कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नह
आँख के शीशे मेरे चुटख़े ए ह कब से
टु कड़ टु कड़ म सभी लोग मले ह मुझ को
37
तेरी सूरत जो भरी रहती है आँख म सदा
अजनबी लोग भी पहचाने से लगते ह मुझे
तेरे र ते म तो

नया ही परो ली म ने!
38

एक से घर ह सभी, एक से बा श दे ह

अजनबी शहर म कुछ अजनबी लगता ही नह
एक से दद ह सब, एक से ही र ते ह
39
पेड़ के कटने से नाराज़ ए ह शायद
दाना चुगने भी नह आते मकान पे प र दे
कोई बुलबुल भी नह बैठती अब शेर पे आकर!
40
ज़रा पैलेट स भालो रंगोबू का
म कैनवस आसमाँ का खोलता ँ
बनाओ फर से सूरत आदमी क ।
41
अजीब कपड़ा दया है मुझे सलाने को
क तूल ख चूँ अगर, अरज़ छू ट जाता है
उघड़ने, सीने ही म उ कट गई सारी
42
म सब सामान लेकर आ गया इस पार सरहद के
मेरी गदन कसी ने क़ ल करके उस तरफ़ रख ली
उसे मुझ से बछड़ जाना गवारा ना आ शायद।
43
हवाय ज़ मी हो जाती ह काँटेदार तार से
जब घसता है द रया जब तेरी सरहद गुज़रता है
मेरा इक यार है ‘द रया-ए-रावी’ पार रहता है

44
म रहता इस तरफ़ ँ यार क द वार के ले कन
मेरा साया अभी द वार के उस पार गरता है
बड़ी क ची सी सरहद एक अपने ज मोजां क है।
45
जस से भी पूछा ठकाना उसका
इक पता और बता जाता है।
या वह बेघर है, या हरजाई है
46
या बतलाय? कैसे याद क मौत ई
डू ब के पानी म परछाई फ़ौत ई
ठहरे पानी भी कतने गहरे होते ह।
47
एक इक याद उठाओ और पलक से प छ के वापस रख दो
अ क नह ये आँख म रखे क़ मती क़ मती शीशे ह
ताक से गर के क़ मती चीज़ टू ट भी जाया करती ह
48
ज म और जाँ टटोल कर दे ख
ये पटारी भी खोल कर दे ख
टू टा फूटा अगर ख़ुदा नकले-!
49
ज़ दगी या है जानने के लये

ज़ दा रहना ब त ज़ री है
आज तक कोई भी रहा तो नह ।
50
ऐसे बखरे ह रात दन जैसे
मो तय वाला हार टू ट गया
तुम ने मुझको परो के रखा था।
51
है नह जो दखाई दे ता है
आइने पर छपा आ चेहरा।
तरजुमा आइने का ठ क नह ।।
52
द रया जब अपने पानी खंगालते ह तुग़यानी म
जतना कुछ मलता है वो सब सा हल पर रख जाते ह
ले जाते ह कम जो लोग ने फके ह द रया म!
53
झु गी के अंदर इक ब चा रोते रोते
माँ से ठ के अपने आप ही सो भी गया है।
थोड़ी दे र को ‘यु

वराम’ आ है शायद।।
54

ऐसे आई है तेरी याद अचानक
जैसे पगडंडी कोई पेड़ से नकले
इक घने माज़ी के जंगल म मली हो।।

55
ज म के खोल के अ दर ढूं ढ़ रहा ँ और कोई
एक जो म ,ँ एक जो कोई और चमकता है
एक मयान म दो तलवार कैसे रहती ह
56
ये सु त धूप अभी नीचे भी नह उतरी
ये स दय म ब त दे र छत पे सोती है।
लहाफ़ उ मीद का भी कब से तार तार आ।।
57
तु हारे ह ठ ब त ख़ु क ख़ु क रहते ह
इ ह लब पे कभी ताज़ा शे’र मलते थे
ये तुमने ह ठ पे अफ़साने रख लये कब से?
58
इतने अस बाद ‘हगर’ से कोट नकाला
कतना ल बा बाल मला है ‘कॉलर’ पर
पछले जाड़ म पहना था, याद आता है।
59
तेरे शहर प ंच तो जाता
र ते मे द रया पड़ते ह-!
पुल सब तूने जला दये थे!!
60
कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते ह

पछले च द महीन से अब वो भी लड़ते रहते ह
लक ह दोन , लगता है अब शाद करने वाले ह
61
कुछ इस तरह याल तेरा जल उठा क बस
जैसे द या-सलाई जली हो अँधेरे म
अब फूंक भी दो, वरना ये उंगली जलाएगा!
62
कांटे वाली तार पे कसने गीले कपड़े टांगे ह
ख़ून टपकता रहता है और नाली म बह जाता है।
य इस फ़ौजी क बेवा हर रोज़ ये वद धोती है।।
63
हल वाहा था “होरी” ने, और ज़मीनदार के खेत ए
ग़ ला बेचा ब नये ने और दाता क तारीफ़ ई
मट् ट क गोद फर ख़ाली, जस ने खेत उगाए थे।
64
आओ ज़बान बाँट ल अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हम को समझना है।
दो अनपढ़ को कतनी मोह बत है अदब से
65
नाप के, व त भरा जाता है, हर रेत घड़ी मइक तरफ़ ख़ाली हो जब फर से उलट दे ते ह उसको
उ जब ख़ म हो, या मुझ को वो उ टा नह सकता?

66
च ड़याँ उड़ती ह मेरे कांच के दरवाज़े के बाहर
नाचती धूप क चगा रय म जान भरी है
और म च ता का तोदह ं जो कमरे म पड़ा है
67
एक त बू लगा है सकस का
बाज़ीगर झूलते ही रहते हज़हन ख़ाली कभी नह होता।
68
चलो ना शोर म बैठ, जहां कुछ न सुनाई दे
क इस ख़ामोशी म तो सोच भी बजती है कान म
ब त ब तयाया करती है यह फापे कुटनी त हाई!
69
प थर क द वार पे, लकड़ी क इक े म म कांच
के अ दर फूल बने ह
एक तस वुर ख़ु बू का और कतने सारे पहनाव
म ब द कया है
इ क़ पे दल का एक लबास ही काफ़ था, अब
कतनी पोशाक पहनेगा।