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कितने पाकिस्तान Kitne Pakistan

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कमलेश्वर का यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है...इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परम्परा अब खत्म हो....
साल:
1999
संस्करण:
Kindle Edition
प्रकाशन:
Rajpal & Sons
भाषा:
hindi
पृष्ठ:
361
फ़ाइल:
EPUB, 1.05 MB
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2 comments
 
Ajju
Whoever has put this Great Book here, please some more such हिंदी Books... I will be extremely thankful.
15 July 2020 (07:33) 
Aku
अद्भुत बहुत ही शानदार किताब हैं
23 February 2021 (19:08) 

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1

Refranes y frases proverbiales españolas de la Edad Media

言語:
spanish
ファイル:
PDF, 53.08 MB
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2

Principles of Genetics

年:
2011
言語:
english
ファイル:
PDF, 132.67 MB
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कितने पाकिस्तान





ISBN : 9788170284765

संस्करण : 2015 © कमलेश्वर

KITNE PAKISTAN (Novel) by Kamleshwar

राजपाल एण्ड सन्ज़

1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट-दिल्ली-110006

फोन: 011-23869812, 23865483, फैक्स: 011-23867791

e-mail : sales@rajpalpublishing.com

www.rajpalpublishing.com

www.facebook.com/rajpalandson





कितने पाकिस्तान



कमलेश्वर





इन बंद कमरों में मेरी साँस घुटी जाती है

खिड़कियाँ खोलता हूँ तो ज़हरीली हवा आती है





यह उपन्यास

यह उपन्यास मन के भीतर लगातार चलने वाली एक जिरह का नतीजा है। दशकों तक सभी कुछ चलता रहा। मैं कहानियाँ और कॉलम लिखता रहा। नौकरियाँ करता और छोड़ता रहा। टीवी के लिए कश्मीर के आतंकवाद और अयोध्या की बाबरी मस्जिद विवाद पर दसियों फ़िल्में बनाता रहा। सामाजिक हालात ने कचोटा तो शालिनी अग्निकांड पर ‘जलता सवाल’ और कानपुर की बहनों के आत्महत्याकांड पर ‘बन्द फाइल’ जैसे कार्यक्रम बनाने में उलझा रहा। इस बीच एकाध फ़िल्में भी लिखीं। चंद्रकांता, युग, बेताल, विराट जैसे लम्बे धारावाहिकों के लेखन में लगा रहा।

इसी बीच भारतीय कृषि के इतिहास पर एक लम्बा श्रृंखलाबद्ध धारावाहिक लिखने का मौका मिला। कई सभ्यताओं के इतिहास और विकास की कथाओं को पढ़ते-पढ़ते चश्मे का नम्बर बदला। एक-एक घंटे की 27 कड़ियों को लिखते-लिखते बार-बार दिमाग़ आदिकाल और आर्यों के आगमन को लेकर सोचता रहा। बुद्धि और मन का सच मोहनजोदड़ो-हड़प्पा सभ्यता और आर्यों के बीच स्थापित किए गए ‘संघर्ष-सिद्धान्त’ को स्वीकार करने से विद्रोह करता रहा। उस एपीसोड को मैंने कई बार लिखा। एक बार तो मैंने ऊब कर, काम निपटाने की नीयत से, पश्चिमी विद्वानों के ‘आर्य-आक्रमण’ के सिद्धान्त को स्वीकार करके वह अंश लिख डाला। फिर लोकमान्य तिलक की इस थ्यौरी और उद्भावना से भी उलझता रहा कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। मैंने इस उद्‌भावना को लेकर वह अंश फिर लिखा; लिखने के बाद भी मन निर्भ्रान्त नहीं हुआ। लगा यही कि यह बात भी रचना के सम्भावित सत्य तक नहीं पहुँचाती। सच को यदि पहले से सोच कर मान्य बना लिया जाए तो यह सत्याभास तो दे सकता है, पर आन्तरिक सहमति तक नहीं पहुँचाता। शायद तब, रचना अपने सम्भावित सत्य को खुद तलाशती है। उसी तलाश ने मुझे यह बताया कि आर्यों के आक्रामक होने के कोई कारण नहीं थे। वे आक्रांता नहीं थे। वे आर्य आदिम कृषि से परिचित खानाबदोश कबीले थे, जो सहनशील;  प्रकृति और सृजनगर्भा धरती की तलाश में निकले थे। सिन्धु घाटी में सहनशीला प्रकृति तो थी ही, सृजनगर्भा धरती की भी कमी नहीं थी। इसलिए आक्रमण या युद्ध की ज़रूरत नहीं थी। आर्य आए और इधर-उधर बस गए होंगे।

वेदों में असुरों से युद्धों की जो अनुगूंज मिलती है, वह निश्चय ही सत्ता, समाज, वैभव और जीवन-पद्धति के स्थिरीकरण के बाद की उपरान्तिक गाथा है। दुनिया की सभ्यताओं के इतिहास में, किसी आक्रांता जाति समुदाय ने वेदों जैसे रचनात्मक ग्रन्थों के लिखे जाने का कोई प्रमाण नहीं दिया है। ऐसे ग्रंथ शांति, धीरज और आस्था के दौर में ही लिखे जा सकते हैं, युद्धों के दौर में नहीं। रचना के इस संभावित सत्य ने मुझे सांत्वना दी। तब ‘कृषि- कथा’ का लेखन हो सका।



इन और ऐसी तमाम रचनाओं, विचारों, इतिहास की सैकड़ों सर्जनात्मक दस्तकों और व्यवधानों के बीच रुक-रुक कर ‘कितने पाकिस्तान’ का लिखा जाना चलता रहा। उन तमाम विधाओं की तकनीकी सर्जनात्मकता का लाभ भी मुझे मिलता रहा। शब्द-स्फीति पर अंकुश लगा रहा।

इसे मैंने मई, सन् 1990 में लिखना शुरू किया था। घने जंगल के बीच देहरादून के झाजरा वन विश्राम गृह में सुभाष पंत ने व्यवस्था करवा दी थी। रसद वगैरह नीचे से लानी पड़ती थी। गायत्री साथ थी ही। साथ में हम अपने 4 बरस के नाती अनंत को भी ले गए थे। एक कुत्ता वहाँ आता था, उससे अनंत ने दोस्ती कर ली थी। उसका नाम मोती रख लिया था। कभी-कभी वहाँ बहुरंगी जंगली मुर्गे भी आते थे। अनंत उन्हें देखने के लिए दूर तक चला जाता था।

जंगल की पगडंडियों से यदा-कदा लकड़हारे आदिवासी गुज़रते रहते थे। एक दिन अनंत मुर्गों का पीछा करते-करते गया तो नज़र से ओझल हो गया। गायत्री बहुत ज्यादा चिंतित हो गई। तलाशा, आवाजें लगाईं, घबरा के इधर-उधर दौड़े-भागे पर अनंत का कहीं कोई पता नहीं चला। तभी एक गुजरते बूढ़े ने बताया कि उसने जंगल में कुछ दूर पर एक छोटे बच्चे को लकड़हारे के साथ जाते देखा था...यह सुनकर गायत्री तो अशुभ आशंका और भय से लगभग मूर्छित ही हो गई। आदिम कबीलों की नरबलि वाली परम्परा की पठित जानकारी ने गायत्री को त्रस्त कर दिया था। आशंकाओं से ग्रस्त मैं भी था। मैं गायत्री को संभाल कर, पानी पिला कर, उसे नौकर के हवाले करके फौरन निकला। बूढ़े ने जिधर बताया था, उधर वाली पगडंडी पर उतर कर तेजी से चला, तो कुछ दूर पर देखा–एक लकड़हारे के कन्धों पर पैर सामने लटकाए उसकी पगड़ी पर बाँहें बाँधे, किलकारी मारता अनंत बैठा था। लकड़हारे के बायें हाथ में कुल्हाड़ी थी, और वह उसे लिए हुए सामने से चला आ रहा था। जान में जान आई। पता चला, वह अनंत को हिरन और भालू दिखाने ले गया था।

इस घटना ने मुझे आदिम कबीलेवालों को जानने, पहचानने और उनके बारे में पठित तथ्यों से अलग अनुभवजन्य एक और ही सोच दी थी। सात-आठ बरस बाद अनुभव के इसी अंश ने मेरा साथ तब दिया जब मैं उपन्यास में माया सभ्यता के प्रकरण से गुज़र रहा था। बहरहाल...



मेरी दो मजबूरियाँ भी इसके लेखन से जुड़ी हैं। एक तो यह कि कोई नायक या महानायक सामने नहीं था, इसलिए मुझे समय को ही नायक-महानायक और खलनायक बनाना पड़ा।

और दूसरी मजबूरी यह कि इसे लिखते समय लगातार यह एहसास बना रहा कि जैसे यह मेरी पहली रचना हो...लगभग उसी अनकही बेचैनी और अपनी असमर्थता के बोध से मैं गुज़रता रहा...आख़िर इस उपन्यास को कहीं तो रुकना था। रुक गया। पर मन की जिरह अभी भी जारी है...


दिल्ली : 29.12.99





दूसरे संस्करण की भूमिका

फरवरी 2000 में इस उपन्यास का पहला संस्करण छपा था। भाई विश्वनाथ जी ने जून में सूचना दी कि दूसरा संस्करण छप गया है, और यह भी कि साढ़े तीन महीनों में ही इसका पूरा संस्करण समाप्त हो गया। यह तब, जब कि किसी सरकारी या थोक खरीद का कोई आर्डर उनके पास नहीं था। सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। इसका मूल्य भी कम नहीं है, कि औसत पाठक आसानी से खरीद सके।

सबसे ज़्यादा और चमत्कृत करने वाला आश्चर्य तो तब हुआ था जब भाई महेंद्र कुलश्रेष्ठ ने इसके छपने के डेढ़-दो महीने बाद बताया था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ नगरों में इसके फोटोस्टेट (पाइरेटेड) संस्करण 80-80 या 100-100 रुपये में बिक रहे हैं।

प्रकाशक के लिए वह सूचना सुखद नहीं थी लेकिन मेरे लिए यह मेरे जीवन की एक सुखदतम सूचनाओं में थी।

अपने प्रकाशक के साथ ही मैं अपने समकालीन लेखक बंधुओं, समीक्षकों, रचनाकारों, प्रतिक्रिया स्वरूप पत्र लिखने वाले सैकड़ों पाठकों, हिन्दी के तमाम समाचार पत्रों, पत्रिकाओं का आभारी हूँ, जिन्होंने अपनी उन्मुक्त-बेलाग प्रतिक्रियाओं से इस रचना को नवाज़ा है।

मैं मन से अभिभूत और विनत हूँ।


5/116, इरोज गार्डन,

सूरजकुण्ड रोड, नई दिल्ली-110044





तीसरे संस्करण की भूमिका

मैं अपने हज़ारों-हज़ार पाठकों का हृदय से आभारी हूँ। सात महीनों में तीसरा संस्करण आना नितांत अकल्पनीय सच्चाई है। और वह भी तब जब कहा जाता है कि पाठकों का अकाल है। यह भी कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पाठकों को पुस्तक से विरत कर दिया है। ऐसे दुष्काल में पाठकों ने मुझे अपने लेखन की सार्थकता का एहसास दिया है।

पुस्तक मेले के समय फरवरी 2000 में इसका पहला संस्करण आया था। चार महीने बाद जून 2000 में दूसरा संस्करण आया, और अब तीन महीने बाद यह तीसरा संस्करण! तीसरे संस्करण की सूचना से पहले मुझे खबरें मिलीं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर और जे.एन.यू. दिल्ली में ‘कितने पाकिस्तान’ की फोटोस्टेट कवर-रहित और कवर-सहित कापियाँ क्रमशः 80-100 और 120 रुपये में बिक रही हैं। कुछ विद्यार्थियों ने चंदा जमा करके इसकी कापी खरीदी और पढ़ी। यही मेरा सबसे बड़ा रचनात्मक प्राप्य है। मैं आने वाले समय को तो नहीं बदल सकता लेकिन जो उसे बदल सकते हैं, उन तक मैं पहुँच सका हूँ।

एक फोटोस्टेट पाइरेटिड प्रति मुझे देखने को मिली। वह मेरे लेखन की अस्मिता का अप्रतिम प्रमाण-पत्र बन गई!

इस उपन्यास पर सब जगहों से प्रतिक्रियाएँ आईं। भारतीय द्विभाषी लेखकों ने उन्मुक्त राय दी। अनुवाद की पेशकश की। अंग्रेज़ी सहित सात भारतीय भाषाओं में अनुवाद की शुरुआत हुई। अप्रत्याशित पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा हुई, हो रही है। जाने-अनजाने पाठकों, विद्वानों, मित्रों की बेलाग प्रतिक्रियाओं से मैं अभिभूत और आप्लावित हुआ।

इसी के साथ-साथ कुछ स्वयंसेवी साहित्यकारों के लिए यह उपन्यास, इसकी सार्वभौम चर्चा और स्वीकृति यंत्रणा का कारण बन गई।

मैंने यह उपन्यास उन्हें कष्ट पहुँचाने के लिए नहीं लिखा था।

साहित्य में इधर एक दशक से घटिया बाज़ारवाद पनपा है। यशप्रार्थी और प्रशंसाप्रदाताओं के रचनास्खलित बौद्धिक बूचड़खानों का तेज़ी से विकास हुआ है। इन बूचड़खानों के दादाओं में आपसी लड़ाइयाँ भी होती रहती हैं। फिर उनके समझौते भी हो जाते हैं। कहीं ज़्यादा गहरे स्वार्थ टकरा गए तो उनके बीच चरित्र-हनन की वारदातें भी हो जाती हैं। वैसे फ़िलहाल दादालोग कुछ पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों पर अपने दुर्गांधित अधोवस्त्र धो रहे हैं। वे अनुभव और प्रश्नों की दुनिया से कट गए हैं।

लगता यही है कि आज शब्द का पारदर्शी पसीना सूख गया है। रौशनाई स्याही में बदल गई है।

अपने इस दौर के ऐसे तमाम सिद्धांतवादियों, स्खलित रचनाकारों, खुद को साहित्य का नियंता समझने वाले कुंठित ईर्ष्यावादियों को गले लगाते हुए इतना ही कहना ज़रूरी समझता हूँ कि–

आ जा रक़ीब मेरे तुझ को गले लगा लूं

मेरा इश्क कुछ नहीं था तेरी दुश्मनी से पहले

अंतत: तो साहित्य और रचना का यह इश्क ही तय करेगा कि कौन कितने आँसुओं के पानी में था और है। बहरहाल।

अभी इस उपन्यास की पाँच प्रतियों की मुझे ज़रूरत पड़ी तो बताया गया कि एक या दो प्रतियाँ तो उपलब्ध हो सकती हैं पर पाँच नहीं। वे भूमिका मिलने और तीसरे संस्करण के छपने के बाद ही उपलब्ध हो सकेंगी। मेरा संतोष यही है कि तमाम पाठक और खास तौर से नौजवान पीढ़ी इसे सात्विक उत्साह से पढ़ रही है। यही पवित्र यश है। यही मेरा प्राप्य है।

पचास-पचपन बरस पहले जो अमूर्त-सी शपथ कभी उठाई थी कि रचना में ही मुक्ति है, उस मुक्ति का किंचित एहसास अब हुआ है। ज़िन्दगी जीने, दायित्वों को सहने और रचना की इस बीहड़ यात्रा के दौरान जो कभी सोचा था, सोचता रहा था कि ‘वाम चिरंतन है’ उसकी गहरी प्रतीति भी मुझे इसके साथ मिली है।

और अंत में इस तीसरे संस्करण के साथ पिछले संस्करणों पर छपी लाइनों कि ‘इन बंद कमरों में मेरी साँस घुटी जाती है, खिड़कियाँ खोलता हूँ तो ज़हरीली हवा आती है’, के गुमनाम शायर को अपनी अकीदत पेश करते हुए अब मैं फिराक़ साहब की इन लाइनों पर अपनी बात को थोड़ा सा विराम देता हूँ :

इन कफस की तीलियों से

छन रहा कुछ नूर-सा

कुछ फज़ा कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो...

साहित्य इसी ‘हसरते परवाज़’ का पर्याय है।


5/116, इरोज गार्डन,

सूरजकुण्ड रोड, नई दिल्ली-110044





पाँचवें संस्करण की भूमिका

इतनी जल्दी फिर यह संस्करण! प्रतिक्रियाओं की भरमार और विचारों की उथल-पुथल। विराट वैचारिक फलक पर इस रचना के इतने विस्तार ने इस ‘मिथ’ को भी तोड़ा है कि हिन्दी में पाठक नहीं हैं, हिन्दी में गम्भीर पाठक नहीं हैं। अगर नहीं हैं तो इस उपन्यास को कौन खरीद रहा है और पढ़ रहा है? प्रकाशन के समय (फरवरी 2000 से जुलाई 2001) से अब तक इन अट्ठारह महीनों में मैं प्रतिक्रियाओं से आप्लावित रहा हूँ। और ये सारी प्रतिक्रियाएँ या तो साधारण पाठकों की हैं या उन पाठकों की, जो हिन्दी के वैचारिक और रचना परिदृश्य से एक साज़िश के तहत अदृश्य रहते या रखे जाते हैं।

अब मैं यह कहने में क़तई संकोच नहीं करूँगा कि इस रचना ने हिन्दी आलोचना के शिविरबद्ध संस्थानों की प्राचीरों के पार जाकर पाठक से वह रिश्ता कायम किया है जो इन व्यक्ति-संस्थानों ने खण्डित कर दिया था। इसने साहित्य के पुरोहितवाद को ख़ारिज किया है।

बहस के कई मुद्दे भी उठे हैं। सन्तोष की बात यह है कि ये मुद्दे पाठकों ने उठाए हैं या रचनाकारों ने पाठकों की तरह उठाए हैं। एक ख़ास मुद्दा इसकी प्रयोगशीलता को लेकर उठा है। अनेक पाठक मित्रों ने देश के कोने-कोने से लिखते हुए इसकी प्रयोगशीलता की पहचान और सराहना की है। अग्रज लेखक विष्णु प्रभाकर जी ने जब यह लिखा कि ‘इसने उपन्यास के बने-बनाए ढाँचे को तोड़ दिया है और लेखकीय अभिव्यक्ति के लिए सब कुछ सम्भव बना देने का दुर्लभ द्वार खोलकर एक नया रास्ता दिखाया है...यह एक नया प्रयोग है।’ तब मैं सचमुच आश्वस्त हुआ कि यदि इसकी प्रयोगशीलता को इस रूप में लिया जा रहा है तो यह मात्र प्रयोग के लिए प्रयोग नहीं बल्कि यह इसका प्रयोजन भी है।

फिर स्वयंप्रकाश जैसे गम्भीर और सृजनरत समकालीन का पत्र मिला। उन्होंने लिखा–‘कहना चाहिए कि यह नाटक की ब्रेख्तियन पद्धति का उपन्यास में पहली बार निवेश करता है—और बेशक खतरे उठाते हुए और इसकी क़ीमत चुकाते हुए भी अपने मक़सदद में कामयाब रहता है...इसलिए इसे क्या कहें? अनुपन्यास? या प्रतिउपन्यास? लेकिन ऐसा कहने से कलावादी-रूपवादी प्रतिक्रियावाद की बू आती है, लेकिन उन्हें देखना चाहिए कि शिल्प के उनसे बड़े और ज़्यादा जोखिमवाले प्रयोग प्रगतिशील लेखक कर सकते हैं।’

परिभाषावाली बात को फ़िलहाल स्थगित रखते हुए प्रयोगवाले मुद्दे पर कालीकट (केरल) से लिखित कोविद अनन्तमूर्ति अनंगम की चन्द सतरें देना चाहता हूँ। इसमें अतिरेक और अतिरंजना है पर वह स्वत:स्फूर्त भी हैं। वे कहते हैं कि ‘इस उपन्यास ने प्रेमचन्द से बहुत आगे जाकर जिस वैश्विक चिन्ता से हमें जोड़ा है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रयोग के धरातल पर तो (इसने) कमाल किया है। प्रेमचन्द प्रयोगवादी नहीं थे, लेकिन प्रयोगवादी वात्स्यायन को उन्होंने सदियों पीछे छोड़ दिया है। (इनकी) भाषा ने जैनेन्द्र की निजी भाषा से हिन्दी को मुक्त करके उस भाषा और मुहावरे को पकड़ा है जो भविष्य की भाषा है।

यह उद्धरण मैं प्रशस्ति-गायन के लिए नहीं, ‘प्रयोग’ के मुद्दे को सुलझाने के लिए दे रहा हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि जो भी प्रयोग इस रचना में हुआ या हो गया है, वह मेरे कारण नहीं बल्कि ‘कथ्य’ के कारण हुआ है। लेखक प्रयोगवादी होने का दम्भ पाल सकता है पर प्रयोग की सारी सम्भावनाएँ केवल कथ्य में निहित होती हैं।

अब परिभाषा का सवाल। यह उपन्यास है या कुछ और, तो मैं यही कह सकता हूँ कि इसे मैंने उपन्यास की तरह ही शुरू किया था और उपन्यास मानकर ही पूरा किया है। इसे उपन्यास की तरह ही पढ़ा गया है। मेरी समझ से यह परिभाषा का कोई संकट खड़ा नहीं करता। यदि थोड़ा-सा संकट खड़ा भी होता है तो इसलिए कि इसमें राष्ट्रीय, सभ्यतागत, समयगत समस्याओं का विस्तार हुआ है। वैश्विक चिन्ताओं के बीच इसमें हर देश में मौजूद ‘अपने देश’ को पहचानने की कोशिश की गई है।

भाषा को लेकर जो सवाल उठे हैं उनको स्पष्ट करने के लिए अहिन्दी भाषाओं के मात्र दो पाठकों के विचार ही काफ़ी होंगे। मराठी भाषी डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे ने कहा है कि बहुत अच्छा मराठी अनुवाद मौजूद होने के बाद भी वे इसे हिन्दी में पढ़ने के लिए उत्सुक हुए और उन्हें यह लगा कि यह (यानी इसकी) हिन्दी उन सबकी हिन्दी है जो हिन्दीवालों की वैयक्तिक हिन्दी नहीं बल्कि भविष्यमुखी राष्ट्रीय हिन्दी होगी। ओड़ीशा में गौरीभुवन दास ने बताया कि ‘यह उपन्यास ओड़िया में सम्भवत: अगस्त में आ रहा है, पर इसके हिन्दी संस्करण के आधार पर कुछ समीक्षाएँ ओड़िया में पहले ही छप रही हैं। उन्हें पढ़कर मैंने बड़ी कठिनाई से हिन्दी संस्करण प्राप्त किया। इसकी हिन्दी हमें सब कुछ सहजता से समझा देती है। यह साम्राज्यवादी हिन्दी नहीं, यह भारतीय हिन्दी है, यह भारत की जनवादी हिन्दी है।’

कुछ जगहों से इसके शीर्षक ‘कितने पाकिस्तान’ को लेकर उत्कट विरोध के स्वर भी सुनाई दिए। प्रमाणस्वरूप कुछ संस्थागत खतो-किताबत मेरे पास है पर उसे मैं फ़िलहाल विवाद का विषय नहीं बनाना चाहता। हिन्दी के प्रतिष्ठानी ‘साहित्यिक स्वयंसेवकों’ ने भी कुछ बौद्धिक दंगा-फ़साद करवाना चाहा, पर व्यापक पाठक वर्ग पर उसका कोई असर नहीं हुआ। एक अपुष्ट समाचार मिला कि जोधपुर में इस उपन्यास की एक प्रति को विरोधस्वरूप जलाया गया। एक प्रति के कारण आग दर्शनीय नहीं बनी, तो जो भी किताबें-काग़ज़ हाथ लगे, उन्हें झोंककर आग को प्रचण्ड बनाया गया। बहरहाल...

मेरा प्राप्य यही है कि मेरे रचनाकार के मन में जो बैचेनी पल रही थी...दिमाग़ पर जो दस्तकें लगातार पड़ रही थीं और जिरह जारी थी, उसमें अब देश के हर कोने का पाठक मेरा सहभागी और सहयात्री है।

यही मेरा भरपूर प्राप्य है। इसने मेरी रचनात्मक उम्र को बढ़ाया है। वामधर्मी होने की मेरी आस्था को भारतीयता के सन्दर्भ और परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया है।

इससे अधिक और मैं क्या चाह सकता हूँ! सिवा इसके कि रचना मुझे रचना के प्रति प्रतिश्रुत बनाए रहे...और इसके आगे की दास्तान को लिखने की ताक़त देती रहे...लेखक-पाठक का यह ज़रूरी और कारगर रिश्ता क़ायम रहे!

विनम्र भाव से पाठकों को फिर प्रणाम करते हुए—


5/116, इरोज गार्डन,

सूरजकुण्ड रोड, नई दिल्ली-110044





छठे संस्करण की भूमिका

पाँचवें संस्करण वाली टिप्पणी में काफ़ी विस्तार से मैंने प्रयोगशीलता और इसके उपन्यास होने की परिभाषा को लेकर अपनी बात रखी थी। पाठकों ने इसे जिस तरह स्वीकार किया है और इसका पाठकीय फलक जिस तेज़ी से विस्तृत हुआ है, उसकी गवाही यह छठा संस्करण दे रहा है।

इस बीच एक उत्साहित करने वाला प्रसंग भी उद्घाटित हुआ है। ‘कितने पाकिस्तान’ को केंद्र में रखकर मथुरा, सतना, छिंदवाड़ा, सोलापुर, लातूर, देहरादून, चंडीगढ़ आदि कई अन्य जगहों, शहरों में इस पर गोष्ठियाँ और विचार-विमर्श हुआ है। जहाँ मैं मौजूद रह सका वहाँ सवाल-जवाब का लम्बा सिलसिला चला है, सुखद अनुभव यह था कि पाठकों की उपस्थिति मुझे चौंकाती थी और सबसे ज़्यादा आश्वस्त करने वाली स्थिति यह थी कि मुझे उनमें से कइयों के हाथों में उपन्यास की चिह्नित प्रति दिखाई देती थी। वे पन्ने पलट कर चिह्नित अंश देखते और उपन्यास के विविध प्रसंगों पर विचार व्यक्त करते थे या प्रतीकों, घटनाओं, वृतांतों के बारे में विस्तृत वर्णन चाहते थे।

यानी हर अध्याय में वे अपनी तरफ़ से कुछ जोड़ना चाहते थे, कई और पाठक चाहते थे कि अदीब की अदालत में कुछ और इतिहास-पुरुषों को बुलाया जाता...रचना के साथ पाठक की सहभागिता की यह अनुभूति विस्मयकारी और विलक्षण थी। मेरे पाठक उपन्यास के अध्यायों के बाद स्वयं अपने मानस में रचनारत थे...यह बहुत गहरी प्रतीति थी...कि रचना यदि पाठक के लिए रचना का मानसिक और वैचारिक अवकाश (स्पेस) पैदा करती है तो लेखक के पास से समाप्त होने के बाद उसकी पुनर्रचना पाठक-दर-पाठक करता रहता है।

और इस प्रक्रिया में अधिकांश उनका था जो नौजवान और छात्र थे! सुखद यह भी था कि इस पर चौदह या पंद्रह लघु शोध प्रबंध (एम.फिल.) उन्हीं छात्रों ने लिखे जिन्होंने इसे ‘अपने अनुभव’ के रूप में ग्रहण किया था।

एक और बात कि इस उपन्यास ने मुझे अलग-अलग जगहों पर गम्भीर समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों से मिलवाया। उन्हें इसमें इतिहास और समाजशास्त्र के कुछ वे स्रोत उजागर होते नज़र आए जिनके बारे में मुझे खुद ज़्यादा पता नहीं था, हालांकि कुछ स्रोतों को मैंने खंगाला ज़रूर था और ज़रूरी लायब्रेरियों और ग्रंथों से उनकी पुष्टि की थी।

एक अन्य स्तर पर इस उपन्यास से सोच और विचार की प्रक्रिया भी शुरू हुई। सभ्यता और संस्कृति के इतिहास वाले पक्ष पर पहली नज़र हिन्दी के प्रखर आलोचक डॉ. पुष्पपाल सिंह ने डाली। उन्होंने विशद रूप से उपन्यास के तमाम प्राण-बिन्दुओं को तलाशा। इसके बाद राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रख्यात इतिहासकार डॉ. देवनारायण आरोपा ने इसे प्राचीन इतिहास और सभ्यताओं के विकासक्रम के फलक पर इसके कथा-वृतांत को फैला कर विवेचित किया और कहा कि ‘यह पुस्तक एक पठनीय सपना भी है और सपना साकार करने की रचना भी।’ इन दोनों जीवन्त बुद्धिजीवियों की राय से मेरा रचना-मन अभी आश्वस्त हुआ ही था कि अमृता प्रीतम जी की प्रतिक्रियाओं की लहर आ गई। अमृता जी ने ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में कहा कि सलमान रुश्दी को अगर भारतीय साहित्य जानना है तो वे ‘कितने पाकिस्तान’ पढ़ लें।

ऐसा नहीं है कि इस उपन्यास को लेकर मैं आश्वस्त नहीं था। लिख लेने के बाद और छपने से पहले मैंने अनासक्त भाव से सोचा था पर फिर प्रतिक्रियाओं का जो आप्लावन हुआ उसने मेरे लेखन का दायित्व और उम्र बढ़ा दी। मिली दुआओं के साए तले मैं हाथ जोड़े बैठा हूँ। मैं विनत भाव से माँ की तस्वीर को देखता हूँ। माँ की नज़रें मुझे नहीं, मेरे कलम को देख रही हैं! पिता तो थे नहीं, पहली बार मुझे कलम पकड़ा कर माँ ने ही अक्षर ज्ञान कराया था।


5/116, इरोज गार्डन,

सूरजकुण्ड रोड, नई दिल्ली-110044





यह आठवाँ संस्करण

चौथे और सातवें संस्करण की भूमिकाएँ नहीं लिखी जा सकीं क्योंकि पुस्तक के इन संस्करणों का तत्काल छपना ज़रूरी था। भूमिकाओं की ज़्यादा ज़रूरत अनुवादक मित्रों और शोध छात्रों को पड़ती है। अभी तक इस उपन्यास का अनुवाद मराठी, उर्दू, उड़िया, गुजराती, पंजाबी और बंगला भाषाओं में हो चुका है।




इस आठवें संस्करण की भूमिका स्वरूप मैं सिर्फ़ एक पत्र और मामूली-सी जानकारी देना चाहता हूँ। पहले डॉ. अरुणा उप्रेती का पत्र :

डॉ. अरुणा उप्रेती

पो. बा. नं. 355

काठमाण्डू (नेपाल)

9 फरवरी 2003

प्रिय कमलेश्वर जी,

मैं डॉ. अरुणा उप्रेती नेपाल की रहनेवाली हूं। मैं पेशे से मेडिकल डॉक्टर हूं। मैं हिन्दी पढ़ सकती हूं, बोल सकती हूं पर लिख नहीं सकती, इसलिए यह ख़त अंग्रेज़ी में लिख रही हूं।

यह ख़त मैं आपको अफ़गानिस्तान से लिख रही हूं। एक मित्र से निवेदन किया है कि वह इसे दिल्ली से आपको पोस्ट कर दे। मैं आपकी पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ लगभग तीस बार पढ़ चुकी हूं (इसका आशय अलग-अलग अंशों को कई-कई बार पढ़ने से ही होगा–लेखक)। इस पुस्तक को लिखने के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहती हूं, क्योंकि हिन्दी में इस प्रकार की पुस्तक का लिखा जाना बहुत मुश्किल है। मैं समझती हूं कि आपने बहुत बड़ा काम किया है।

जैसा कि मैंने पहले बताया, मैं पेशे से डॉक्टर हूं और अफ़गानिस्तान के धुर देहात में घायलों और बीमारों की देखभाल के काम में लगी हुई हूँ। यहाँ पूरी नाउम्मीदी (और मौत) के बीच मुझे इस किताब से आशा की किरणें फूटती दिखाई देती हैं और यह संतोष होता है कि मानवीयता अभी ख़त्म नहीं हुई है।

मैं यह भी कहना चाहूंगी कि बिना आपकी अनुमति के आपके विचार और भाषा को मैंने नेपाली में लिखी कविताओं में उतार लिया है। मैंने यह इसलिए भी किया है कि जब कोई लेखक अपनी पुस्तक प्रकाशित करा देता है तो वह सिर्फ़ उसकी सम्पदा नहीं रह जाती, वह आम जन की हो जाती है।

मैं मई महीने में नेपाल वापस पहुँचूंगी, यदि आप आ सकें तो मेरा आतिथ्य स्वीकार करें। मुझे बहुत खुशी होगी।

आपकी

अरुणा उप्रेती




मैंने उत्तर दे दिया था। फिर सितम्बर में मुझे डॉ. अरुणा उप्रेती का पत्र मिला कि वे मेडिकल टीम के साथ अफ़गानिस्तान से इराक चली गई थीं। ज़रूरी चीज़ों की तरह वे इस उपन्यास को भी साथ ले गई थीं। पर इराक में बढ़ते फिदायीन हमलों के कारण उन्हें वापस नेपाल भेज दिया गया है। और वे दिल्ली आकर मुझ से मिलेंगी।

तो इस आठवें संस्करण की भूमिका के लिए फिलहाल इतना ही।


5/116, इरोज गार्डन,

सूरजकुण्ड रोड, नई दिल्ली-110044





और अब नौवाँ संस्करण

मैं अपने पाठकों का बहुत आभारी हूँ। यह नवम संस्करण मैं भारत के उन पाठकों को समर्पित करता हूँ जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। खासतौर से इसलिए कि अन्य मातृभाषा वाले पाठकों के पत्रों से उनकी यह इच्छा ज़ाहिर हुई कि वे ‘कितने पाकिस्तान’ पढ़ना चाहते हैं, ज़ाहिर था कि वे हिन्दी में प्रकाशित उपन्यास ही पढ़ना चाहते थे, क्योंकि उन्हें अपनी भाषा में प्रकाशित अनुवाद की जानकारी नहीं थी। वैसे ‘कितने पाकिस्तान’ का अनुवाद, अब तक उर्दू, मराठी, गुजराती, पंजाबी, ओड़िया और बंगला में हो चुका है और अन्य लगभग सभी भारतीय भाषाओं में हो रहा है। लेखन की सार्थकता और विस्तृत पाठकवर्ग तक इसके पहुँचने का गहरा संतोष मुझे अगला उपन्यास लिखने की प्रेरणा देता है। मैं नये उपन्यास का लेखन शुरू कर चुका हूँ।

‘कितने पाकिस्तान’ का अंग्रेज़ी अनुवाद जनवरी 2006 में आ गया है और इसे अंतर्राष्ट्रीय पाठकवर्ग के लिए पेंग्विन बुक्स ने प्रकाशित किया है। साथ ही इसका अनुवाद स्पेनिश, फ्रेंच और जर्मन में भी प्रस्तावित है। यह जानकारी मात्र इसलिए कि मैं अपने पाठकों को अपनी इस खुशी और लेखकीय संतोष में शामिल करना चाहता हूँ।





अंतर्वस्तु


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1


एक भूली हुई दास्तान उसे याद आती है।

वह तो एक बंजर जमीन से आया था। खामोश आकर्षणों की दुनिया से, जहाँ कहा कुछ भी नहीं जाता। मन ही मन में कुछ अरमान करवटें लेते हैं। अनबूझी इच्छाएँ आती और चली जाती हैं...और कस्बाई सपने छतों पर फैले कपड़ों की तरह धूप उतरते ही बटोर लिए जाते हैं। कुछ अनकहे धुंधले-से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं, जो न घटते हैं न बढ़ते हैं। बस, पानी के दाग़ की तरह वजूद के लिबास पर नक्श हो जाते हैं।

उसका पूरा क़स्बा, उसके क़स्बे का अपना मोहल्ला, मोहल्ले की कई खिड़कियाँ भी उसे मौन हसरत से देखती दिखाई दी थीं। कभी-कभी बरसात के दिनों में लौटते हुए पाँवों के निशान दिखाई पड़ जाते थे। ज्यादा बारिश हुई तो निशान पहले तो भरी आँख की तरह डबडबाते थे, फिर देखते-देखते मिट जाते थे। वापस गए पैर फिर नज़र नहीं आते थे। कुछ आँखें थीं, जो कहना तो बहुत कुछ चाहती थीं, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं था। कहीं कोई काजल लगी आँख उलझी थी। किसी खिड़की में हल्की-सी कोई परछाईं। किसी में इशारा करती कोई उँगली। कहीं शरमा के लौटते हुए अधूरे अरमान और कहीं किसी मजबूरी की कोई दास्तान...

अजीब दिन थे।

नीम के झरते हुए फूलों के दिन।

कनेर में आती पीली कलियों के दिन।

न बीतनेवाली दोपहरियों के दिन।

और फिर एक के बाद एक, लगातार बीतते हुए दिशाहीन दिन।

उन दिनों भविष्य कहीं था ही नहीं। एक व्यर्थ वर्तमान साथ था जो बस, चलता जाता था। यह आज़ादी से ठीक पहले का दौर था। रेलगाड़ियों में आरक्षण की सुविधा और सिस्टम नहीं था। अब उसे याद नहीं–विद्या शायद साइंस में थी, पर छुट्टियाँ साथ-साथ होती थीं, इसलिए वे इलाहाबाद स्टेशन पर मिल ही जाते थे। विद्या फतेहगढ़ की थी। तीज-त्यौहार और फिर गर्मियों की छुट्टियाँ। अपने-अपने घर जाने के लिए एकाध बार तो उससे ऐसे ही मुलाकात हुई, फिर जब भी कोई छुट्टी आती तो स्टेशन पर एक-दूसरे का इंतज़ार करने लगे। न मालूम यह कैसा लगाव था कि प्लेटफार्म पर, एक तब तक रुका रहता था, जब तक दूसरा आ नहीं जाता था। अनकहे तरीके से यह तय हो गया था कि छुट्टी होने वाले दिन की सुबह, पहली पैसिंजर गाड़ी से ही सफ़र किया जाएगा। उन दिनों भी कुछ तेज़ एक्सप्रेस गाड़ियाँ चलती थीं, पर उन्हें पैसिंजर ही पसंद थी। वह धीरे-धीरे चलती और हर स्टेशन पर रुकती थी।

उन दोनों को साथ-साथ सफ़र करते, छोटे-छोटे स्टेशनों के नाम रट गए थे। अब बमरौली आएगा। अब मनौरी, अब सैयद सरावां और फिर भरवारी और सिराथू । उसके बाद फतेहपुर। और फिर...फिर कानपुर ! स्टेशनों के नाम वे साथ-साथ पढ़ते थे और किस स्टेशन पर कितनी जल-क्षमता वाली टंकी विशाल कुकुरमुत्ते की तरह खड़ी है, यह भी उन्हें याद हो गया था। इंजन किस स्टेशन पर पानी लेगा, यह भी उन्हें पता था। कुछ ऐसा भी था जो दोनों को एक साथ व्यापता था। उनके मन की अनकही इच्छाओं के पल एकाएक एक साथ जुड़ जाते थे। अब यही, जैसे भरवारी स्टेशन के समोसे ! अभी विद्या कहने को ही होती थी कि वह बोल पड़ता था–खट्टी चटनी...या फिर फतेहपुर की दही की पकौड़ियों पर मीठी चटनी।

कभी-कभी वह भागते पेड़ों में से किसी एक को सहसा एक साथ देखते थे।

फिर कुछ स्टेशनों का साथ और...चाहते तो दोनों नहीं थे, पर कानपुर आ ही जाता था। विद्या वहीं उतर कर फतेहगढ़ वाली गाड़ी बदलती थी। कानपुर से उसे छोटी लाइन पकड़नी होती थी, जिसका प्लेटफार्म आखिरी था। बीच में बड़ी लाइन के कई प्लेटफार्म थे। उन दिनों ‘टाटा’ और ‘बॉय-बॉय’ नहीं होता था। फ्लाइंग किस तो था ही नहीं। खामोशी की गहराई ही शायद लगाव का पैमाना था। विद्या चुपचाप उतरती थी। वह उसका झोला या टीन का छोटा बक्सा या किताबों का बस्ता उठाकर थमा देने में मदद कर देता था। उन दिनों लेट होने पर गाड़ियाँ भी एक-दूसरे का इन्तज़ार कर लेती थीं। विद्या ‘अच्छा’ कहकर पुल पर चढ़कर अपनी गाड़ीवाले प्लेटफार्म पर चली जाती थी। वह उसे छोड़ने या विदा देने नहीं जा पाता था, क्योंकि तब तक उसकी मेन लाइन की गाड़ी छूट सकती थी।

कानपुर से उसका सफ़र शिकोहाबाद जंक्शन तक जारी रहता था, जहाँ से वह ब्रांच लाइन की गाड़ी पकड़कर अपने मैनपुरी पहुँचा करता था। माँ के पास। शिकोहाबाद से मैनपुरी तक के तीन स्टेशनों के नाम तो उसे याद थे, पर कहाँ, किस स्टेशन पर पानी की टंकी थी और छोटे से सफर में कौन से पेड़ साथ दौड़ते थे, वे उसे याद नहीं थे। विद्या भी सफ़र में साथ होती, तो शायद उसे वे पेड़ याद रहते।




छुट्टियों से लौटने का दिन और इलाहाबाद तक जाने वाली पैसेंजर गाड़ी भी अनकहे तरीके से तय हो गई थी...वह लौटते समय कानपुर तक मेन लाइन की गाड़ी से आता था, लेकिन कानपुर से पैसिंजर ही पकड़ता था। छोटी लाइन से आकर विद्या उसे प्रतीक्षा करती मिलती थी।

मिलना, प्रतीक्षा और साथ-साथ सफ़र करना, यह दो साल चलता रहा। फिर वह वर्ष भी आया। गर्मी की लंबी छुट्टियाँ हुईं। वही इलाहाबाद स्टेशन। वही पैसिंजर गाड़ी। लेकिन इस बार स्टेशनों का नज़ारा कुछ बदला हुआ था। गाड़ी में चढ़ने वाले मुसाफ़िर औसत से ज़्यादा खामोश थे।

सैयद-सराँवा स्टेशन पर सब स्टेशनों से ज़्यादा भीड़ मिली। सफ़र में ज़्यादातर मर्द ही मिलते थे, पर इस बार उनके साथ औरतें और बच्चे भी थे। टीन के बक्सों, बोरों, गठरियों, पोटलियों वाला सामान भी ज़रूरत से ज़्यादा था। गाड़ी छूटी तो प्लेटफार्म पर रुक कर कोई ‘खुदा-हाफ़िज़’ कहकर बिदा करनेवाला नहीं था।

मुसाफिरों में चलती आपसी बातचीत के दौरान पता चला था कि वे किसान खानदान पहले अलीगढ़ जा रहे थे, वहाँ से पाकिस्तान चले जाएँगे।

आख़िर कानपुर स्टेशन का यार्ड गुज़रने लगा। गाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ने लगी। विद्या को तो यहीं उतरना था। प्लेटफार्म आया। विद्या उतरी। हमेशा की तरह उतर कर उसने विद्या को सामान थमाया। तब विद्या ने इतना ही कहा था–

–शायद आगे की पढ़ाई के लिए मैं अगले वर्ष न आ सकूँ।

–क्यों ?

–घरवाले यही चाहते हैं।

यह एक सहज सूचना थी, जिससे दोनों ने ही कुछ असहज महसूस किया था। उनके बीच अलिखित और अव्यक्त भावनाओं का रिश्ता तो शायद बहुत गहरा था, परंतु कहीं कुछ ऐसा नहीं था जो उन्हें कोई उत्तर मांगने के लिए विवश करे।

आखिर छोटी लाइन की अपनी गाड़ी पकड़ने के लिए वह पुल पर चढ़ने लगी। विद्या की गाड़ी छूटने का समय हो रहा था और उसकी गाड़ी भी छूटने को थी।

और बस, तब इस दास्तान में इतना ही हुआ था कि पुल पर पहुँच कर, अपने प्लेटफार्म की तरफ़ मुड़ने से पहले विद्या ने अपना रूमाल ऊपर से गिराया था...

उसकी गाड़ी उसी समय आखिरी सीटी देकर खिसकने लगी थी। उसका डिब्बा भी काफी आगे था। उसने रूमाल को गिरते हुए देखा था, उसके लिए वह अटका भी था, पर प्लेटफार्म छोड़ती गाड़ी को वह नहीं छोड़ पाया था। सफ़र तो सफ़र था। और फिर डिब्बे में उसका झोला लावारिस पड़ा था, जिसमें उसकी किताबें, कापियाँ और क़लमें थीं।

विद्या का रूमाल तो वह नहीं उठा पाया, पर अपने सफ़र को भी वह नहीं तोड़ पाया। चलती गाड़ी में वह चढ़ा और अपनी जगह आकर बैठ गया। आगे का सफ़र जारी था। उसका भी और उन मुसाफ़िरों का भी, जो अलीगढ़ होते हुए पाकिस्तान जा रहे थे। विद्या का भी, जो गाड़ी बदल कर फतेहगढ़ की ओर चली जा रही होगी। बैठे-बैठे वह यही सोचता रहा कि अगले साल अब विद्या नहीं आएगी, इसका सीधा मतलब यही है कि उसके घरवालों ने कहीं उसका रिश्ता तय कर दिया होगा, और इन्हीं गर्मियों में उसकी शादी हो जाएगी...

शिकोहाबाद जंक्शन आया तो वह उतर पड़ा। उसे मैनपुरी वाली गाड़ी पकड़नी थी। पाकिस्तान जाने वाले मुसाफ़िरों का सफ़र अलीगढ़ की तरफ़ जारी था।

उन गर्मियों के बाद फिर विद्या उसे नहीं मिली। पता नहीं वह कहाँ किस सफ़र पर निकल गई।

बस, इतना ज़रूर हुआ कि जिंदगी के इस लंबे सफर में जब भी वह कानपुर स्टेशन से गुज़रा, तो वह रूमाल हमेशा उसे गिरता हुआ दिखाई देता रहा, दिखाई ही नहीं देता रहा...वह रूमाल सचमुच गिरता रहा...वह रूमाल आज भी गिरता है...

फिर कई बरसों के बाद, जब वह कई नौकरियों और कई शहरों को छोड़ता हुआ शहर बंबई में टिक कर काम करने लगा, तो उसे एक अजीब-सा रहस्यभरा ख़त मिला। उसका लिफ़ाफ़ा खुद अपने सफ़र की कहानी बता रहा था। वह उसके पिछले कई पतों से रिडायरेक्ट हो कर उस तक पहुँच ही गया था। उसने कई बार कटे हुए पतों को देखा था। सिर्फ उसका नाम ज्यों का त्यों था।

मेहरबान हाथों ने अलग-अलग लिखावट में उसका नया पता दर्ज किया था। तब उसे लगा था कि ख़त अगर मन से भेजा जाए तो कई जन्मों के बाद भी, पहुँचनेवाले तक पहुँच ही जाता है।

पाँच पतों से लौटे हुए लिफाफे को उसने बहुत एहतियात से खोला था। मज़मून पढ़ा तो रहस्य बहुत गहरा गया था। लिखा था–

अदीबे आलिया !

किसी को देके दिल कोई नवासंजे फ़ुगां क्यों हो

न हो जब दिल ही सीने में, तो फिर मुँह में ज़ुबाँ क्यों हो !

किया ग़मख़्वार ने रुसवा, लगे आग इस मुहब्बत को

न लाए ताब जो ग़म की, वो मेरा राज़दां क्यों हो !

वफ़ा कैसी, कहाँ का इश्क, जब सर फोड़ना ठहरा

तो फिर ऐ संगेदिल ! तिरा ही संगे आस्तां क्यों हो !

—खु़दा हाफ़िज़...

ख़त में कोई नाम नहीं था। पता भी नहीं था। उसे ख़त के सम्बोधन ने भी चौंकाया था।

एकाएक उसका ध्यान विद्या की ओर गया था। मज़मून में बात की जो अनुगूंज थी...वह उसकी हो सकती थी। और फिर अदीबे आलिया वाला सम्बोधन। शायद वह उसकी ज़िन्दगी की खोज-ख़बर लेती रही हो। अन्दाज़ से उसने पहला पता लिखा हो...कि शायद ख़त पहुँच जाए...फिर तो पते मेहरबानों ने बदले थे...

लेकिन सबसे ज़्यादा हैरत में डालने वाली बात तो यह थी कि विद्या तो साइंस की विद्यार्थी थी। उसे हिन्दी तो फिर भी आती थी, लेकिन उर्दू का तो एक हर्फ़ भी नहीं आता था। और फिर अन्त में–खु़दा हाफ़िज़...

नहीं...नहीं...यह विद्या तो हो ही नहीं सकती थी। यह और कोई भी हो, विद्या नहीं हो सकती।

और तब यह दास्तान और ज़्यादा रहस्यमयी बन गई थी...आश्चर्यजनक और अज़ीबोग़रीब। हुआ यह था कि...





2


–हुआ यह था नहीं...सर ! पहले यह सुनिए कि हुआ क्या है...

उसने चौंककर आवाज़ की तरफ देखा था। उसका ‘एक में तीन’–सहायक, स्टेनो और अर्दली महमूद उसके सामने खड़ा था। उसके हाथ में टेलिप्रिंटर से आई ख़बरों के कुछ खुरदरे काग़ज़ों के टुकड़े थे।

–क्या हुआ है ? उसने पूछा।

महमूद ने ख़बरें उसके सामने रख दीं।

ख़बरों पर नज़र डालते उसने शीशे की दीवार से बाहर देखा। हॉल में लंबे डेस्क के इर्द गिर्द शाम की शिफ्ट के सारे पत्रकार तेज़-तर्रार बातों में उलझे हुए थे। और दोनों समाचार सम्पादक तेज़ी से उसके केबिन की ओर चले आ रहे थे। पहला सिटी एडीशन मशाीन पर जानेवाला था। बेसमेंट में मशीनों के चलने की हलकी थरथराहट वह महसूस कर रहा था। तब तक दोनों न्यूज़ एडीटर उसके केबिन में आ गए।

–सर ! इस वक्त तो आपके फ्रंट पेज ऐडीटोरियल की ज़रूरत है...

–अभी आप डिक्टेट कर दें सर तो पहले एडीशन में चला जाएगा ! ज़रूरी भी है...

–ठीक है...कम्प्यूटर रूम में बोल दो। तैयार रहें...एक प्याला कॉफी ले आओ। उसने कहा तो महमूद हुक्म बजाने चला गया। उसने बज़र देकर उसे वापस बुलाया।

फिर उसने जल्दी-जल्दी डिस्पैचेज़ पढ़े...वही फिर हुआ था...सन् 1948, 1965 और 1972 की तरह !

कारगिल के इलाके में घुसपैठियों के नाम पर फिर पाकिस्तानी फौजियों ने अघोषित आक्रमण कर दिया है...लद्दाख में कारगिल, बटालिक, द्रास, मश्को, तुर्तक, ज़ोजीला, काकसर, चिल्डियाल, घोघ, होतापाल क्षेत्र की नियंत्रण रेखा को तोड़ कर पाकिस्तानी फ़ौजियों ने कई-कई मील अंदर तक अपने अड्डे और बंकर बना लिए हैं। वैसे पाकिस्तान के फौजी अफसरों का कहना है कि वे घुसपैठिए इस्लामी मुजाहिदीन हैं, लेकिन असलियत यही है कि मुजाहिदीनों के भेष में वे पाकिस्तानी फौजी हैं !

–इतना ही नहीं सर ! समाचार सम्पादक ने कहा–पाकिस्तानियों ने सन् 1972 के सन्धिपत्र का उल्लंघन किया है। इसी साल मित्रता, भाइचारे और व्यापार के लिए की गई ‘लाहौर घोषणा’ की पीठ में छुरा भोंक दिया है। फौजों का मूवमेंट तो प्रधान मन्त्री की लाहौर यात्रा से बहुत पहले शुरू हो चुका है, लेकिन दुश्मन ऊँची पहाड़ियों पर काबिज़ हो चुका है, इसलिए अपनी जान-माल का बहुत नुकसान हुआ है...

–तो नजम सेठी से फोन मिलाओ ।

–नजम सेठी ?

–हाँ...हाँ...नजम सेठी, एडीटर ‘फ़्राइडे टाइम्स’, लाहौर पाकिस्तान ! मुँह क्या देख रहे हो ? क्या तुम्हें इतना भी पता नहीं कि लाहौर पाकिस्तान में है...

–जी, वह तो है, लेकिन...सर...नजम सेठी इसमें क्या करेंगे ?

–वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से पूछेंगे कि यह क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है ?

–सर ! पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और उनके विदेश मंत्री ने कहा है कि हमारी फ़ौज का घुसपैठियों से कोई लेना-देना नहीं है...यह समस्या भारत की है ।

–अगर यह मान भी लिया जाए तो भी वे आए तो पाकिस्तान की धरती से हैं...

–यही तो सर ! अगर पाकिस्तान लाहौर घोषणा पत्र में दी गई दोस्ती की शर्त से सहमत है, तब तो उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह घुसपैठियों को अपने इलाके में से गुज़र कर भारत की सीमाओं में पहुँचने से रोके !

–सर ! अगर यह हमला युद्ध में बदल गया, तब तो बड़ा नुकसान होगा !

–दोनों मुल्कों में नुकसान सिर्फ़ अवाम का होगा...इसीलिए तो मैं फ़ौरन नजम सेठी साहब से बात करना चाहता हूँ...क्योंकि पाकिस्तान में उन जैसे दानिशमंद और अवामपरस्त पत्रकारों की आवाज़ें ही इस खून-ख़राबे को रोकने का माहौल बना सकती है...

तब तक दूसरा न्यूज़ एडीटर कारगिल में मारे गए सैनिकों की लिस्ट ले आया–

–सर ! यह है हमारे अब तक के शहीद सिपाहियों और वायु सैनिकों की लिस्ट, जिन्होंने आज की तारीख तक अपनी कुर्बानी दी है...नागालैंड के सिपाही से लेकर कोटा राजस्थान, बिहार, कर्नाटक, कन्याकुमारी, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र, पंजाब, हरियाणा के जाँबाज़ सैनिकों और हवाबाज़ शहीदों के नाम इसमें दर्ज हैं...

–अर्दली ! उसने आवाज़ लगाई।

–यस सर ! महमूद ने हाज़िरी दी।

–डिक्टेशन लो...लिखो–

प्रिय प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री जी !





3


प्रिय प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री जी ! आप दोनों के नाम हम यह खुला ख़त बहुत भारी दिल और अफ़सोस के साथ लिख रहे हैं ! हमने पिछले सप्ताह अपने पाठकों को कारगिल की भयानक युद्ध-स्थिति की वह ख़बरें और जानकारी दी थी, जिससे आप दोनों बेख़बर बने हुए थे।

हमने कहा था कि यह रवैया आत्मघाती है और देश के नागरिकों को सूचना दी थी कि कांग्रेस देशी-विदेशी (सोनिया गांधी को लेकर) के मसले में फँसी हुई है। भाजपा और उसकी मित्र पार्टियाँ अपने निजी कार्यक्रमों में व्यस्त हैं। कामचलाऊ प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जगजीत-गुलज़ार के कैसेट ‘मरासिम’ का लोकार्पण कर रहे हैं। अख़बार वर्ल्ड-कप की खबरों से भरे हैं...जो सूचनाएँ देश को तत्काल मिलनी चाहिए, उसके सूत्रों को संभालने वाले सूचना-प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन प्रसार भारती को समाप्त करने की मुहिम में मशगूल हैं। विदेश मंत्री जसवन्त सिंह कारगिल सीमा पर चल रही विदेशी गोलाबारी से बेखबर, मध्य एशिया के देशों से मैत्री सम्बन्ध बनाने में व्यस्त हैं। और हमारे रक्षामंत्री, जार्ज फर्नांडिस योगोस्लाविया पर हो रहे नैटो-अमरीकी हमलों पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं...कोई भी पार्टी, नेता या राजनेता देश की उत्तरी सीमा पर चल रहे इस विस्फोटक युद्ध पर न तो चिंता व्यक्त कर रहा है, न कोई बयान दे रहा है, जबकि उत्तरी सीमान्त पर कारगिल-द्रास के इलाके में पाकिस्तानी तोपें पिछले पखवाड़े से अपने बारूदी बयान लगातार दर्ज कर रही हैं !...घुसपैठियों को नियंत्रण रेखा के उस पार खदेड़ने का काम तब ही किया जा सकता है, जब देश की सत्ता-सरकार अपना राजनीतिक फ़ैसला घोषित करे...यह लापरवाही हमें भारी पड़ सकती है !

तो प्रधानमंत्री जी, यह चेतावनी छपने के बाद आपके सलाहकार श्री ब्रजेश मिश्र जी का चेहरा स्टार-न्यूज़ में पहली बार दिखाई दिया। और बातों के अलावा उनके बयान में यह भी निहित था कि कारगिल-द्रास-बटालिक क्षेत्र में आतंकी घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर सरकार का खुफ़िया सूचना तंत्र निष्क्रिय था। इतना ही नहीं, मिश्र जी ने सेना के सूचना तंत्र को भी इशारतन दोषी ठहरा दिया।

और उसके बाद फिर देश को विश्वास में लेने के लिए ‘ऑफेंसिव आपरेशन्स’ के निदेशक एयर कमोडोर सुभाष भोजवानी और ‘आर्मी आपरेशन्स’ के उपमहानिदेशक ब्रिगेडियर मोहन भंडारी को दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में सामने लाया गया और उनसे यह ख़बर दिलवाई गई कि आज सुबह पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों को भारतीय इलाकों से खदेड़ने के लिए कारगिल क्षेत्र में हवाई हमला किया गया। साथ ही भारत ने चेतावनी दी कि इस कार्रवाई में यदि पाकिस्तान ने हस्तक्षेप किया तो भारतीय सेना ‘उचित उत्तर’ देगी !

दोनों सैनिक अधिकारियों ने यह भी बताया कि हवाई अभियान के परिणाम स्वरूप घुसपैठियों को चारों तरफ से घेर लिया गया है। उन्हें हासिल होनेवाली (पाकिस्तान से) किसी भी तरह की (यानी राशन, गोला, बारूद, घायलों के लिए दवाओं आदि) आपूर्ति रोक दी गई है। भागने के उनके रास्ते भी बन्द कर दिए गए हैं। यह सब जानकारी सेना के गुप्तचर सूत्रों के हवाले से दी गई। यह भी बताया गया कि 160 पाकिस्तानी घुसपैठिए मार गिराए गए हैं।

तो, प्रधानमंत्री जी, यह तो आपके नैतिक पतन की पराकाष्ठा है कि जब आपकी सरकार गिराई गई थी, तो दूसरे ही दिन आप देश की जनता को सन्देश देने के लिए दूरदर्शन पर मौजूद थे, लेकिन जब उत्तरी सीमान्त पर स्क्वाड्रन लीडर अजय कुमार आहूजा मारा गया, फ़्लाइट लेफ्ट़िनेंट नचिकेता अपनी जान को खतरे में डालकर क्षतिग्रस्त जहाज से कूदा, जब कारगिल क्षेत्र में ही वायुसेना का हेलिकॉप्टर क्षति-ग्रस्त हुआ और चालक दल के चार सदस्य मारे गए, साथ ही सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध होने के बावजूद, यह बताया गया है कि हमारी सेना के 29 जवान मारे गए हैं, 128 घायल हैं तथा 12 लापता हैं, तब इस देश को विश्वास में लेने के लिए और उसके संकट और दु:ख में शामिल होने के लिए आपको दूरदर्शन पर आने की जरूरत महसूस नहीं हुई ! यह संवेदनहीनता की इन्तिहा है !

और–आपके यह रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस तो ऊल-जलूल बयान देने के विशेषज्ञ बन चुके हैं ! पोखरन परमाणु विस्फोटों को उचित ठहराते हुए उन्होंने चीन को दुश्मन नम्बर एक घोषित करने में देरी नहीं की थी और अपनी गुप्तचर सूचनाओं का हवाला देते हुए उन्होंने यहाँ तक कह डाला था कि चीन ने भारत के विरुद्ध तिब्बत में परमाणु मिसाइलें तैनात कर रखी हैं। लेकिन इस बार उनकी गुप्तचर एजेंसी उन्हें कारगिल क्षेत्र में घुसकर जम जाने वाले पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों की जानकारी नहीं दे सकी, जो तब से वहाँ पहुँच चुके थे, जब से उत्तरी सीमान्त के पहाड़ों की बर्फ़ पिघली है...

और ऊपर से तुर्रा यह कि रक्षामंत्री ने अपने बेहूदे और दायित्वहीन बयान में यहाँ तक कह डाला कि इस घुसपैठ में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान सेना के गुप्तचर संगठन आईएसआई का हाथ नहीं है। यह घुसपैठ पाकिस्तानी सेना की करतूत है। भारत के रक्षामंत्री को मालूम होना चाहिए कि यह एक हास्यास्पद बयान है, बल्कि लगता तो यह है कि माननीय रक्षामंत्री की औसत चेतना और समझ कुन्द हो चुकी है।

अगर सचमुच ऐसा है कि पाकिस्तान में कार्यपालिका, उसकी अन्य एजेंसियों और सेना के बीच आपसी तालमेल नहीं है, यदि वे अपने फैसले लेने के लिए एक दूसरे से स्वतंत्र हैं, तब तो यह और भी ख़तरनाक स्थिति है !

आज जबकि दोनों देश परमाणु शक्ति से संपन्न हैं तो क्या हमारे बीमार-दिमाग़ रक्षामंत्री हमें यह संकेत दे रहे हैं कि आज यदि भारत पाक युद्ध हो जाता है (जिसके खिलाफ दोनों देशों की जनता है !) तो उसका फैसला पाकिस्तान की सरकार के हाथों में नहीं, बल्कि पाकिस्तानी फौज के हाथों में होगा ! इसी तर्क से यह संकेत भी मिलता है कि परमाणु विकल्प के मामले में भी फैसला पाकिस्तानी फौज के तानाशाहों के हाथों में होगा, जनता द्वारा दो तिहाई जनमत से चुनी गई नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तानी सरकार के हाथों में नहीं !

इतने ऊल-जलूस, तर्करहित, दायित्वहीन बयान और विश्लेषण यदि देश का रक्षामंत्री दे सकता है तो दोनों देशों की अमन पसन्द जनता को उसका भगवान या अल्लाह ही बचा सकता है। रक्षामंत्री के इस बयान से पाकिस्तान के अमन पसन्द लोकतंत्रवादी तत्वों की बेचारगी उद्घाटित होती है और भारत के लोकतंत्रवादी तत्वों को यह बयान दिग्भ्रमित करता है। दोनों तरह से, दोनों देशों के लोकतंत्रवादियों का अहित करता है। शैतानी चतुराई से भरा यह बयान, सम्भव सत्याभास पैदा करके पाकिस्तानी सेना को नक्कू बनाता है और बिना कहे यह कहता है कि इसका सामना और मुकाबला सैन्य शक्ति द्वारा ही किया जा सकता है ! क्योंकि पाकिस्तान की मौजूदा सरकार का कोई अंकुश अपनी सेना पर नहीं है। सत्य का आभास देते ऐसे ‘मासूम’ बयान बातचीत के रास्तों को अघोषित तरीके से व्यर्थ घोषित करते हुए कट्टरपंथी मुठभेड़वादियों के हाथ का हथियार बन जाते हैं ! ज़ाहिर है कि ऐसा बयान कोई पागल रक्षामंत्री ही दे सकता है; और यदि वह पागल नहीं है तो निश्चय ही महाधूर्त है !

अब आप इतना तो कीजिए कि सेना का साथ दीजिए और सेना के जो पराक्रमी जवान और वायुसेना के जांबाज़ पायलट अपनी जान दाँव पर लगाकर देश की रक्षा के लिए कटिबद्ध हैं, उन्हें आपकी लापरवाही की कीमत अपनी कुर्बानियों से न चुकानी पड़े।

आप लोगों के पैर में आई मोच तक का इलाज देश के खर्चे पर विदेशों में होता है। जो 128 सैनिक घायल हुए हैं, उन्हें विदेश भेजना तो सम्भव नहीं होगा, पर देश में ही अच्छे से अच्छे अस्पतालों में उनके उपचार की व्यवस्था कीजिए।

भटिंडा में शहीद स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की अन्त्येष्टि हो गई। वहाँ तो आप और आपके रक्षामंत्री संवेदना प्रकट करने पहुँच नहीं पाए, क्योंकि आप दोनों ही बहुत व्यस्त हैं और फिर रक्षामंत्री तो इस अंदाज़ में कारगिल का दौरा करने चले गए जैसे कि वे सैन्य-संचालन के विशेषज्ञ हैं ! उन्हें वापस बुलाइए और आप दोनों कोटा (राजस्थान) जाकर शहीद अजय आहूजा के शोक सन्तप्त परिवार को सान्त्वना दीजिए। वैसे किसी सन्दिग्ध या अपराधी चरित्र के नेता-राजनेता के यहाँ कोई मौत हो जाती है, तो वहाँ संवेदना प्रकट करने के लिए आपकी बिरादरी के लोग पहुँच ही जाते हैं। यहाँ तो एक जाँबाज़ सिपाही देश के लिए शहीद हुआ है !

फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता की बहनें, माता-पिता और घरवाले पिछली तमाम रातों से सो नहीं पाए हैं...नचिकेता को पाकिस्तान से वापस लाकर उसे उसके घरवालों के हवाले कीजिए और अपनी राजनीतिक लापरवाही की इस बड़ी गलती के लिए उसके परिवार से माफ़ी मांगिए !

12 लापता जवानों का पता लगाइए और आज सुबह तक जो 29 जवान शहीद हुए हैं, उनके लिए इस देश से क्षमा-याचना कीजिए!

उम्मीद है कि आप अभी पूरी तरह संवेदना शून्य नहीं हुए हैं। सत्ता प्रेम के चलते लापरवाही बरतने का जो जघन्य अपराध आपसे हुआ है, उसके लिए आप इतना तो कर ही सकते हैं !

–देश के शोकग्रस्त समय में शामिल एक अदीब और पत्रकार !





4


ख़त भेजने के बाद अदीब बहुत परेशान था।

वह सोच रहा था कि उसके उद्गार और विचार कहीं देश की रक्षा-सुरक्षा के नाम पर दूसरों के लिए मौत तो पैदा नहीं करते ! क्या एक के जीवित रहने के लिए दूसरे की मौत ज़रूरी है ?

मौत !

सारे युद्ध-महायुद्ध यही तो बताते हैं कि मौत के योगफल के आधार पर ही हार जीत तय हो सकती है।

तुम कितनी मौत दे सकते हो ! वह कितनी मौत उठा सकता है ! जब तक दूसरा जीवित रहता है, पहला नहीं जीतता। मौत ही जय-पराजय को तय करती है। सभी युद्धों-महायुद्धों की यही तो हार जीत है...फिर चाहे वह कुरुक्षेत्र में आर्यों का महाभारत संग्राम रहा हो या आर्याना के डेरियस और यूनानी मिल्डियाडिस का मेराथन के मैदान में हुआ युद्ध !

अभी अदीब यह सब सोच ही रहा था कि धरती से प्रलयंकारी झंझावात उठने लगे। काली आँधियाँ चलने लगीं और सारा आकाश अंधेरे में डूबने लगा। न मालूम ऐसे में सूर्य जैसा शाश्वत प्रकाश भी क्यों मलिन पड़ जाता है।

झंझावात। काली आंधियाँ। वन-प्रान्तरों में मचता कोहराम। इधर उधर विक्षिप्त से भागते वन्य जीव। इतना अधिक क्रन्दन और चीख़-पुकार। अदीब ने दोनों कानों पर हथेलियाँ रख के अपने श्रवण स्रोत बन्द कर लिए और चीख़ा–महमूद !

कोई उत्तर नहीं आया। वह फिर चीख़ा, फिर भी उसे कोई जवाब तो नहीं मिला, पर देखा, सामने से गिरता-पड़ता-हाँफता महमूद चला आ रहा है।

–कहाँ थे तुम ?

–हुजूर...मैं पिछली सदियों में चला गया था।

–पिछली सदियों में...क्यों ?

–मैं अपने पूर्वजों से मिलने गया था !

–पूर्वजों से ! अदीब ने आश्चर्य से पूछा।

–हुजूरे आलिया ! आपको इतना ताज्जुब क्यों हो रहा है...हमारा मज़हब सबसे नया है, हमने इसे सबसे बेहतर पाया, तभी तो हम पुराने धर्मों को छोड़कर इस्लाम में आए हैं...इसका यह मतलब तो नहीं कि हमारे कोई पूर्वज नहीं हैं। वे चाहे जैसे भी रहे हों...पतित या पवित्र, पर हैं तो हमारे पूर्वज ही !

–यह बहस इस समय छोड़ो...सबसे पहले यह मालूम करो कि काली आँधियाँ क्यों चल रही हैं...यह वन्य पशु व्याकुल होकर क्यों भाग रहे हैं ? यह हाहाकार क्यों हो रहा है ?

–शायद इसकी वजह शंबूक की हत्या होगी !

–शंबूक ?

–हाँ हुजूर ! मैं ख़ुद अपने पूर्वज राजा रामचंद्र को देखकर आया हूँ...जब-जब इस धरती पर धर्म की हानि होती है, तब-तब यह काली आँधियाँ चलती हैं...मैंने अपनी आँखों से देखा है...सुबह का समय था हुजूर...अयोध्या का राजप्रसाद वेद मंत्रों की पवित्र ध्वनि से गूँज रहा था। अयोध्या के राजा रामचंद्र अश्वमेध यज्ञ की घोषणा करने राजप्रसाद से अभी बाहर आए ही थे कि यज्ञ की घोषणा से पहले उन्होंने एक ब्राह्मण का करुण रोदन-क्रंदन सुना...वे हतप्रभ रह गए। हमारे रामराज्य में यह करुण विलाप कैसा और क्यों ?

एक अमात्य ने आगे बढ़कर क्रन्दन करते ब्राह्मण को उनके सामने कर दिया–महाराजाधिराज ! यह ब्राह्मण ही विलाप का कारण बता सकता है...

वह ब्राह्मण अपने पुत्र के मृत शरीर को छाती से लगाए राजा रामचंद्र को धिक्कारने लगा–अयोध्यापति राम ! पिता के सामने पुत्र की मृत्यु ! यह कैसा रामराज्य है तुम्हारा ? तुम हत्यारे हो मेरे पुत्र के ! तुम !

–तभी हुजूरे आलिया ! लोगों में कानाफूसी होने लगी...यह तो घोर पाप है...ब्राह्मण का बेटा मर जाए और क्षत्रिय राजा कुछ न कर सके, यह तो अनिष्ट का लक्षण है !

–सतयुग में ऐसा नहीं हो सकता ! इसका कोई कारण होना चाहिए...

–कारण मैं बताता हूँ ! तभी नारदजी ने हमेशा की तरह हाज़िर होकर राजा रामचंद्र को बताया–महाराजाधिराज राम ! धर्मशास्त्रों के अध्ययन, तप और साधना से मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों को है, लेकिन भगवन् ! आपके रामराज्य में एक महापातकी घटना घटी ! उसका कारण है शूद्रवंशी शंबूक ! जो अपने दास धर्म को त्याग कर मोक्ष के लिए साधना कर रहा है...इस महापाप के कारण ही ब्राह्मण-पुत्र की मृत्यु हुई है महाराज ! नारदजी ने सूचना दी। बस फिर क्या था अदीबे आलिया ! राजा रामचंद्र जी ने क्षत्रिय धर्म का पालन किया और ब्राह्मण धर्म की रक्षा के लिए शूद्र शंबूक जैसे ॠषि और तपस्वी की गर्दन काट कर धड़ से अलग कर दी...यह झंझावात और काली आँधियाँ रामराज्य के इसी जघन्य अपराध और पाप के कारण चल रही हैं !

–तुम किस दौर की बात कर रहे हो महमूद ?

–हुजूर ! यह सतयुग की बात है...मैं उसी दौर के बीच से अभी लौटा हूँ। लौटते वक्त वैदिक युग भी रास्ते में मिल गया...वह अपना माथा पीट रहा था।

–क्यों, ऐसी क्या बात थी ?

–हुजूर ! हर दौर अपने कुकर्मों पर पछताता है यही कुछ वहाँ हो रहा था ताकि अगली सदियाँ खुद को पाप से बचा सकें...

–हाँ महमूद...शायद पछताने की ताकत रखनेवाली संस्कृतियाँ ही जीवित रहती हैं...और वे जीवित संस्कृतियाँ ही सभ्यताओं के रूप में स्थापित हो पाती हैं। कर्म और कुकर्म के मानदंड स्थापित कर लेना मामूली बात नहीं है...अदीब ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। फिर पूछा–तो तुम जब लौट रहे थे तब वैदिक युग अपना माथा क्यों पीट रहा था ?

–हुजूर ! वह आसक्ति और व्यभिचार-बलात्कार की दास्तान है...ॠषि गौतम की पत्नी अहिल्या अपूर्व सुन्दरी है। अप्सराएँ भी उसके सामने कुछ नहीं है। वैदिक देवता इंद्र उस पर आसक्त हो गया। उसने ॠषि गौतम का भेष धारण किया, चौकसी के लिए उसने चंद्रमा को साथ लिया। उसे आश्रम के द्वार पर नियुक्त किया और...और ॠषि पत्नी अहिल्या के साथ तब इन्द्र ने संभोग किया...

अदीब ने कुछ पल कुछ सोचा...फिर वह आक्रोश से भर गया।

–कहाँ है वह बलात्कारी इंद्र ! उसे मेरे सामने हाज़िर करो ! अदीब चीखा।

–हुजूर ! आप कोई अदालत तो नहीं कि आप इंद्र पर बलात्कार का मुकद्दमा चला सकें !

–मत भूलो महमूद ! किसी भी दौर के अत्याचारों अनाचारों के खिलाफ खड़ा होने वाला कोई-न-कोई अदीब हमेशा एक नैतिक अदालत बन कर मौजूद रहता है !

–लेकिन हुजूर...ॠषि गौतम तीनों को सज़ाएँ सुना चुके हैं...इंद्र को उन्होंने शाप दिया है–ओ दुराचारी इंद्र...तेरा पराभव होगा ! जिस आसक्ति के कारण तूने मेरी पत्नी अहिल्या के साथ दुराचार किया है, ऐसे सहस्रों पाप तेरे शरीर में प्रगट होकर तुझे जीवन भर लज्जित करते रहेंगे...

–और चंद्रमा को क्या सज़ा मिली ?

–ॠषि गौतम ने उसे शाप दिया है कि तेरे शरीर पर मृगचर्म के दाग़ हमेशा बने रहेंगे...तुझे क्षय रोग लगेगा। महीने में केवल एक दिन तुझे पूर्णता मिलेगी, बाकी दिनों में तू रुग्ण रूप में घटता-बढ़ता म्लान बना रहेगा ! फिर ॠषि गौतम ने अपनी पत्नी अहिल्या को देखा और शाप दिया...

–लेकिन अहिल्या को क्यों ? अदीब ने टोका

–वह इसलिए हुजूर कि विलासी आर्यों ने औरत को हमेशा पुरुष की सम्पत्ति माना है...अपनी पत्नी अहिल्या को देखते ही वे भड़क उठे–तू कैसी पतिव्रता पत्नी है...तुझे किसी के कपट का पता नहीं चला...तू पर-पुरुष और अपने पति का भेद......नहीं जान पाई ! रूपगर्विता हृदयहीना ! जा...पत्थर की शिला बन जा ! अहिल्या ने निर्दोष होने की बात कह कर कई बार क्षमा माँगी, तब ॠषि गौतम ने कृपा कर इतना ही कहा कि ठीक है...एक कल्प के बाद त्रेता युग में जब विष्णुरूपी राम का अवतार होगा और उनके चरण तेरी शिला-शरीर पर पड़ेंगे, तभी तेरा उद्धार होगा !

–यह तो न्याय नहीं है...इन ब्राह्मणों ने अपने श्रमजीवियों को शूद्र तो बनाया ही, इन्होंने स्त्री को भी दंड देकर शूद्रा की श्रेणी में डाल दिया !

–इसीलिए तो मैं कहता हूँ हुजूर कि जब-जब अन्याय, अत्याचार और अनाचार होता है, तब-तब मनुष्य की चेतना और आत्मा को यह प्रलयंकारी झंझावात झकझोरते हैं और काली आंधियाँ चलती हैं...

–लेकिन आज तो वह दौर नहीं है...फिर भी यह प्रलयंकारी झंझावात ! यह काली आंधियाँ...अरण्यों में विक्षिप्त-से भागते वन्य जीव...यह कोहराम...शोर...

–हुजूर ! यह महाविनाशी महाभारत के संग्राम का शोर है। हस्तिनापुर से कौरव सैनाएँ कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि के लिए प्रस्थान कर चुकी हैं। यमुना को पार करके उत्तर पश्चिम में कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ अपनी व्यूह रचना कर रही हैं...और उधर–दक्षिण पूर्व से मत्स्य प्रदेश, अलवर, विराट और जींद के क्षेत्रों से आगे बढ़कर पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना शिविरबद्ध हो चुकी है...

–महमूद ! मुझे इस विनाशकारी महासंग्राम का पूरा विवरण चाहिए !



ठीक अट्ठारह दिन बाद महमूद लौटा। उसने रपट पेश की–हुजूर ! कौरव हार गए हैं...उनमें से कोई जीवित नहीं बचा है...कौरवों के प्रथम सेनापति भीष्म पितामह थे। पहले दिन कौरवों की विजय हुई। पांडवों का शक्तिशाली योद्धा विराट पुत्र उत्तमकुमार मारा गया। तीसरे दिन अर्जुन ने कौरवों के महारथियों–भीष्म, द्रोण, अम्बष्ठपति, चित्रसेन, श्रुतायु, जयद्रथ, कृप, भूरिश्रवा, शल और शल्य पर सफलता प्राप्त की...कौरव हताश हो गए। तीसरे दिन...

अदीब ने टोका–मुझे हर दिन की तफसील नहीं चाहिए...सिर्फ यह बताओ कि कुल कितने योद्धा और सैनिक मारे गए हैं !

–इसका हिसाब तो मैंने नहीं रखा हुजूर...लेकिन शायद यमराज बता सकें या महाराज चित्रगुप्त जो हर पल मरने वालों का हिसाब रखते हैं !

–यमराज से तो मैं नहीं मिलना चाहूँगा...पर महाराज चित्रगुप्त से कहो...वे अपना रजिस्टर लेकर फौरन हाज़िर हों !

चित्रगुप्त जी को आने में देर नहीं लगी। बेहद वजनी होने के कारण वे रजिस्टर और फाइलें तो नहीं ला सके थे, पर उनके पास एक विलक्षण लघु यंत्र था...उसमें सब कुछ दर्ज था और वे पलक झपकते ही बड़ी से बड़ी संख्या का योग या गुणन योग बता सकते थे।

–महाभारत युद्ध में मरनेवालों की संख्या कितनी थी ? अदीब ने पूछा।

–असंख्य और उनमें से पाँच पाण्डवों और श्रीकृष्ण के अलावा कोई जीवित नहीं बचा है। चित्रगुप्त बोले–उन मृतकों की संख्या इतनी अधिक है कि उसे उच्चरित करने में बहुत समय नष्ट होगा...बस इतना जान लीजिए कि दोनों ओर से कुल अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाएँ युद्ध में उतरी थीं और एक अक्षौहिणी सेना में एक लाख नौ हजार पचास पैदल सैनिक, इकत्तीस हज़ार हाथी और पैंसठ हज़ार छह सौ दस घोड़े होते हैं...यानी इतने ही योद्धा और ! इनका गुणा अट्ठारह से कर दीजिए तो...चित्रगुप्त ने अपने यंत्र की ओर देखा।

–रहने दीजिए...रहने दीजिए ! अदीब बोला–इतने अधिक मृतकों की संख्या की बात सोच कर ही मेरे होश उड़े जा रहे हैं...मुझे चक्कर आ रहे हैं...कहते हुए अदीब माथा पकड़ कर बैठ गया। आँखें हथेलियों से ढक लीं। दोनों हथेलियाँ गीली हो गईं महाराज चित्रगुप्त के पास समय नहीं था। वे अंतर्ध्यान हो गए...

झंझावात, काली आंधियाँ फिर चलने लगीं। वन-प्रान्तरों में कोहराम मचने लगा। तभी एक कृशकाय वृद्ध अदीब के सामने आकर खड़ा हो गया। अदीब ने आँसू भरी आँखें उठाकर उसे देखा। प्राणरहित कृशकाय वृद्ध ने उसे देखा।

–आप ! आप कौन हैं ? अदीब ने पूछा।

–मैं तुम्हारी ही तरह एक आम आदमी हूँ...तुम लिखते हो, मैं लिखता नहीं पर मैं भी उसी तरह का काम करता हूँ...उस वृद्ध ने शांत स्वर में कहा।

–कैसा काम...?

–मेरी एक प्रयोगशाला है। मैं हर अभावग्रस्त, शोषणग्रस्त, यातनाग्रस्त और मृत्युग्रस्त मनुष्य के आँसू एकत्रित करता हूँ...

–तो आप मुझसे क्या चाहते हैं ?

–तुम्हारे आँसू ! वृद्ध बोला।

–मेरे आँसू !

–हाँ...मनुष्य के आँसुओं से पवित्र कुछ भी इस दुनिया में नहीं है अदीब ! मैं उन्हीं पवित्र आँसुओं को अपनी अँजुरी में भरकर ले जाता हूँ...मैं उन आँसुओं का अध्ययन करता हूँ...उनके संताप, दुख, यातना और पीड़ा के ताप की पहचान करता हूँ...

–आप तो बड़ा आश्चर्यजनक प्रयोग कर रहे हैं बाबा...इनसे कोई निष्कर्ष भी निकाले हैं आपने ?

–हाँ...लेकिन मेरे निष्कर्षों पर कोई ध्यान नहीं देता...न दुख समाप्त होता है, न दुखों और विषमता के कारण...मेरी बात कोई सुनता ही नहीं...बस...मैं आँसुओं को जमा करता जाता हूँ...

–कहाँ ?

–अश्रु सागर में...

अदीब कुछ चौंका।

–सदियों से मैं यही कर रहा हूँ और देख रहा हूँ...सदियों मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा। प्रकृति बाँझ हो गई तो मनुष्य ही मनुष्य का शोषण करने लगा...इसलिए अब आँसुओं की बाढ़ आ गई है...क्योंकि मनुष्य ने मनुष्य के खिलाफ अब यन्त्र का आविष्कार कर लिया है...

अदीब ने उसे आश्चर्य से देखा।

–देखो अदीब ! ब्रह्मांड की अमूर्त पराशक्ति ने अशक्त हो गए शरीर से आत्मा की स्वाभाविक मुक्ति के लिए मृत्यु का एक सामान्य विधान बनाया था, लेकिन जब से मनुष्य ने मृत्यु का आविष्कार किया है, तबसे युद्धों में अप्राकृतिक मृत्युएँ होने लगी हैं...नर संहार होने लगे हैं...मैं कुछ नहीं कर पाता...बेबस हूँ...इसलिए अदीब ! हर अप्राकृतिक मृत्यु के साथ मैं मरता हूँ...मैं एक ही समय में सहस्रों मृत्युएँ स्वीकार करता हूँ...मैं कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में लाखों-करोड़ों बार मरा हूँ...मैं मेराथन के संग्राम में भी बार-बार मरा हूँ...और आबेला के युद्ध में भी...उसके बाद झेलम, कैने, सोमनाथ, तराइन, क्रेसी, पानीपत जैसे सैकड़ों संग्रामों में मैं ही मरता रहा हूँ मैं करोड़ों, पद्म और नील की संख्याओं में बार-बार और हर बार मरता रहा हूँ...क्योंकि मनुष्यहंता मनुष्य ने एक अप्राकृतिक मौत का अन्वेषण कर लिया है...

–तो इस गैरज़रूरी मौत का प्रतिकार कैसे होगा बाबा ?

–हमें मृत्यु के बदले जीवन को तलाशना होगा अदीब ! और इसी तलाश के लिए मुझे तुम्हारे आँसुओं की ज़रूरत है। आँसू ही जीवन को जीवित रख सकते हैं... कहते हुए उस कृशकाय वृद्ध ने अदीब की आँखों के आँसू निचोड़ लिए और बोला–इन आँसुओं का मैं अध्ययन करूँगा...निष्कर्ष निकालूँगा और उन्हें अपने पास रख लूँगा...जानता हूँ मेरी बात कोई सुनेगा नहीं बस, कोई रोएगा तो उसके आँसू लेने चला जाऊँगा, नहीं तो मैं आँसुओं के उसी समुद्र के किनारे बैठा रहूँगा और सुनता रहूँग कि कौन रोया है...उसी से मुझे पता चलता रहेगा कि कौन अप्राकृतिक मौत से मारा गया है...

...तब तो इस बेसूद और ग़ैरज़रूरी मौत से निजात पाने के लिए जिन्दगी की सार्थक तलाश में किसी को निकलना ही पड़ेगा !

–उस तलाश के लिए हित्ती सभ्यता का गिलगमेश निकल चुका है...उसने घोषणा की है–मैं पीड़ा से लड़ूँगा, यातना सहूँगा कुछ भी हो मैं मृत्यु को पराजित करूँगा !





5


और तभी युरुक के सम्राट गिलगमेश की गूँजती आवाज़ आयी–

–मैं पीड़ा से लड़ूँगा...यातना सहूँगा...कुछ भी हो मैं मृत्यु को पराजित करूँगा...मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊँगा !

सम्राट गिलगमेशा की यह धीर-गंभीर आवाज़ ब्रह्मांड में गूँजने लगी। बेबेलोनियाँ, मेसोपोटामिया, सुमेरी-अक्कादी और सिंधु घाटी सभ्यता के देवता काँपने लगे। युरुक की वह विशाल दीवार थरथराने लगी, जिसे ख़ुद पृथ्वी-सम्राट गिलगमेश ने देवताओं के लिए बनवाया था। वे मंदिर भी काँपने लगे, जिनमें उसने देवी ईना के साथ-साथ सर्वोच्च ईश्वर अनु और सर्वोच्च देवी ईश्तर की प्रतिमाएँ स्थापित की थीं।

सम्राट गिलगमेश ने दुबारा घोषित किया–

–मैं पीड़ा से लड़ूँगा...यातना सहूँगा...कुछ भी हो मैं मृत्यु को पराजित करूँगा...मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊँगा।

सम्राट गिलगमेश की घोषणा सुन कर प्रत्येक सभ्यता के देवताओं की दुनिया में कोलाहल मच गया। सुमेरी सभ्यता का परम विलासी देवता यवनिक चीख़ने लगा–

–सुनी आप सबने सम्राट गिलगमेश की घोषणा ! वह मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोजना चाहता है !

–ग़लती हमारी है ! सुमेरी सभ्यता के दूसरे देवता वपुन ने ऊँची आवाज़ में कहा–जब पराशक्ति ने जीव को जन्म देकर जीवन की लालसा, सुख का अबाध अधिकार और विवेक की शक्ति दी थी, तब हमने इसका विरोध नहीं किया था ! यही मौलिक ग़लती हमने की थी !

–तो पराशक्ति से हमें पूछना चाहिए कि मनुष्य यदि हम देवताओं की तरह अमरत्व प्राप्त कर लेगा तो सृष्टि का क्या होगा ? तब तो यह नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगी। मनुष्य पाप और सुख-विलास की वासना में लिप्त होकर निरंकुश हो चुका है। मनुष्य की सृष्टि में सब कुछ अवैध है...यदि वह मृत्यु को जीत कर हमारी सृष्टि में आ बसा तो हमारा यह स्वर्गिक-संसार प्रदूषित हो जाएगा...बेबेलोनिया का डरा हुआ देवता बेबोलोनिस अन्य सभ्यताओं के देवताओं को आगाह करने लगा और कहने लगा–

–पराशक्ति से हम देवताओं को इसका उत्तर माँगना चाहिए ! और सुनो–सिन्धु सभ्यता के सर्वशक्तिमान आर्य देवता इंद्र का तत्काल पता करो और उनसे कहो कि वह पराशक्ति से उत्तर लेकर आएँ !

तभी देवताओं की इस संगत में तीन संदेशी आकर उपस्थित हुए। एक संदेशी ने अपनी रपट और खुफ़िया जानकारियाँ पेश कीं–

–श्रीमन ! युरुक का सम्राट गिलगमेश नितान्त चरित्रभ्रष्ट मनुष्य है...वह महाविलासी है। वह विश्व-विजय के लिए निकला तो कोई शक्तिवान उससे लोहा नहीं ले पाया। अपनी विजय यात्रा में उसने सहस्रों कुँआरी कन्याओं का शील भंग किया। पराजित योद्धाओं की पत्नियों और स्त्रियों को उसने अंकशायिनी बनाया...वह उद्दाम वासना से ग्रस्त परमविलासी सम्राट है, जो अब एकाएक पुण्यात्मा बन कर मृत्यु से मुक्ति की औषधि प्राप्त करने का नाटक कर रहा है...

तीनों सभ्यताओं के देवताओं ने यह बयान सुनकर दूसरे संदेशी की ओर देखा।

तो बेबोलोनिस ने कहा–

–लेकिन गिलगमेश कुछ भी कर सकता है...इसीलिए मैं कहता हूँ उन आर्य कबीलों का पता करो, जो अपने देवताओं के साथ न जाने किन दिशाओं की ओर चले गए हैं...क्योंकि गिलगमेश को आर्य देवता इंद्र ही परास्त कर सकता है !

–श्रीमन ! आर्यों के वे कबीले जो सहस्रों-सदियों पहले क्रोशिया के विंदिजा इलाके से चले थे, उनमें से कुछ थक कर रूस के दक्षिणवर्त्ती घास के मैदानों में रुक गए थे। जिन कबीलों का साथ कुदरत ने नहीं दिया, वे मिस्र की तरफ निकल गए, लेकिन आर्यों के बड़े-बड़े कबीलों को पूरब का सूरज ज़्यादा आकर्षित कर रहा था। उन्होंने प्रकाश की दिशा–पूरब की ओर बढ़ना ही पसन्द किया। अन्धकार के बाद उदित होकर पूरब का सूरज उन्हें पुकारता था...इसलिए वे आर्य कबीले उफरातु और तिग्रा नदियों से होते हुए, उस पार जाकर तबरेज और तेहरान के रास्ते सिन्धु घाटी की ओर बढ़ गए !

–इसका मतलब है कि आर्य कई कबीलों में बँट गए हैं...

–हाँ, श्रीमन ! आर्य कबीलों का दूसरा कारवाँ मशद के इलाके को छोड़ता हुआ हेरात और बलख़ के रास्ते बोलन दर्रे से सिंधु-प्रदेश में दाखिल हुआ था। आर्यों का तीसरा कारवाँ, जो खैबर दर्रे को पार करके सिंधु घाटी में दाखिल हुआ, वह मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा के इलाके में बस गया है...शायद इन्हीं आर्यों का राजा है इंद्र ! वह भी सम्राट गिलगमेश की तरह महाविलासी है...

–हमें उसकी विलासिता से लेना देना नहीं है। हमें तो पराशक्ति से सवाल करना होगा कि उसने मनुष्य जाति को विवेक की शक्ति क्यों दी है ?

और तब इस प्रश्न के उत्तर में सप्त-सिंधु की आर्य सभ्यता से इंद्र का उत्तर गूंजता हुआ आया था–

–सुनो ! पराशक्ति मौन है...वह विखंडित होते परमाणु का आधारभूत रूप है। वही ब्रह्मांड की मूल मौन शक्ति है। ब्रह्मांड इसी की ऊर्जा से बनता, इसी में टिका रहता है और इसी में विलीन हो जाता है। वह आदि-अंत से परे है। अपरिमित और अपरिमेय है, अज्ञात और अज्ञेय है, अद्वितीय है। परा-अपरा है। नित्य है। शाश्वत और सनातन है। तेज-पुंज है। ब्रह्मांड के सहस्रों सूर्यों से अधिक तेजस्वी ! पदार्थ इसी में जन्मता और इसी में विलीन होता है। जो कुछ भूलोक, द्युलोक और अंतरिक्ष लोक में अवस्थित है, वह सब वही है। इससे परे कुछ भी नहीं है। यही है चेतना, ऊर्जा या आदि परमाणु की पराशक्ति ! हमने, हमारी सभ्यता ने इसे ब्रह्म पुकारा है। ब्रह्म है, यह निश्चित है, परंतु वह क्या है, यह अनिश्चित है...वह रूपाकार से परे है। वह व्याख्याहीन, अद्वितीय, अज्ञेय और अद्वैत है ! वह प्रश्नों से उपराम है...

सिन्धु सभ्यता का यह सन्देश पाकर देवताओं की मंडलियों में खामोशी और निराशा छा गई। वे जानते थे कि ब्रह्म शक्ति अथवा आदि परमाणु शक्ति को लेकर जितने आत्मिक और दैविक अनुसंधान सिंधु सभ्यता ने किए हैं, उतने किसी अन्य सभ्यता ने नहीं, उनकी पराशक्ति सम्बन्धी इस दार्शनिक व्याख्या को नकारना कठिन था। देवताओं की गोष्ठी में चिन्ता छा गई।

सबके सामने एक ही प्रश्न था–सुमेरी सभ्यता के पृथ्वी-सम्राट गिलगमेश को आख़िर कौन रोकेगा ? कौन ?

तभी सुमेर के पर्वतों से निकलकर सर्वशक्तिमान अनु उपस्थित हुआ। चिन्ताग्रस्त देवताओं को उसने ढांढ़स बंधाया–

–आंतकित होने की आवश्यकता नहीं है...यद्यपि सम्राट गिलगमेश ने युरुक में ईना का मंदिर बनवा कर उसमें मेरी और युद्ध की देवी ईश्तर की विशाल प्रतिमाएँ स्थापित की हैं, लेकिन जब उसने अपने पाप, अनाचार और अत्याचार से त्राहि-त्राहि मचा दी, लोगों का जब करुण क्रंदन मुझे सुनाई दिया तो मैंने उस असाधारण तथा प्रचंड सम्राट गिलगमेश को समाप्त कर देने या क्षुद्र बना देने की योजना बनाई। मैंने आकाश-पुत्र एंकिदू को मनुष्य का जन्म देकर पृथ्वी पर भेजा...

एंकिदू एकदम आदिम, जंगली, पशुतुल्य और बर्बर था। उसके शरीर पर वन्य पशुओं की तरह बाल थे। वह जंगली जानवरों के साथ रहने लगा। वह उन्हीं की तरह कच्चा मांस खाता था और ज़रूरत पड़ने पर घास भी खा लेता था।

एक दिन एक शिकारी जंगल में शिकार के लिए पहुँचा। वहाँ एकाएक उसने एंकिदू को देखा तो भयभीत हो उठा। जो कुछ भी शिकार उसके हाथ लगा था, उसे उठाकर वह घर की ओर भागा। उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे। काँपते हकलाते उसने अपने पिता को बताया–

–जंगल में मैंने एक भयानक विलक्षण मनुष्य को देखा है। वह जंगली जानवरों के साथ रहता है। उन्हीं के समान घास-पात खाता है, लेकिन उसे देखने से ऐसा लगता है कि वह अवतारी पुरुष है !

–मेरे बेटे ! पिता ने कहा–तुम फौरन युरुक जाओ और सम्राट गिलगमेश को सूचित करो। उसे निश्चय ही देवताओं ने पृथ्वी पर भेजा होगा क्योंकि देवता लोग हमारे सम्राट गिलगमेश से भयभीत हैं...सम्राट गिलगमेश की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। हमारे सम्राट बहुत चतुर, बुद्धिमान और शक्तिवान है...। उन्हें संसार के अनेकानेक रहस्यों का पता है...सम्राट जानते हैं कि यह देवता लोग आलसी और अकर्मण्य हैं। ये उपजीवी हैं, जो मनुष्य और परमसत्ता के बीच में स्थापित हो गए हैं...वे हमारे सम्राट को नष्ट करना चाहते हैं...तुम तत्काल उस विलक्षण अवतारी वन्य पुरुष की सूचना सम्राट को दो और सुनो, उस वन्य अवतारी पुरुष को वश में करने के लिए तुम ईना के प्रेम मन्दिर की सबसे सुन्दर देवदासी को लेकर जंगल में जाओ। देर मत करो...जाओ...

वह शिकारी युरुक के लिए रवाना हो गया। वहाँ पहुँचते ही उसने सारी सूचना सम्राट गिलगमेश को दी, तो सम्राट ने कहा–

–यह निश्चय ही मेरे विरुद्ध देवताओं का षड्‌यंत्र है...तुम्हारे पिता ने ठीक कहा है। तुम ईना के प्रेम मन्दिर की सबसे सौंदर्यशाली देवदासी रूना को लेकर जंगल में जाओ। मैंने इन देवताओं की जीवन शैली को देखा है। यह लोग स्त्री के प्रति तत्काल आसक्त हो जाते हैं। इनकी वासना जाग पड़ती है और ये अपनी साधना और लक्ष्य को भूल जाते हैं। निश्चय ही मेरा वह शत्रु भी नारी सौन्दर्य के प्रति आकर्षित हो जाएगा। तब वन्य पशु उसे अपने समाज में रखने से इंकार कर देंगे ! सप्त सिन्धु की आर्य सभ्यता भी अपने देवताओं को वश में रखने के लिए अप्सराओं का उपयोग करती है। तुम तुरन्त परम सौंदर्यशाली देवदासी रूना को लेकर जंगल में जाओ और उस अवतारी वन्य पुरुष को उस स्त्री का दास बना दो...

आदेश पाकर वह शिकारी उसी अत्यन्त सौन्दर्यशील देवदासी रूना को लेकर जंगल में पहुँचा और एक झील के किनारे एंकिदू की प्रतीक्षा करने लगा। तीन दिन बाद वन्य पशुओं का एक झुंड उस झील के किनारे आया। इस झुंड में एंकिदू भी था। शिकारी उसे देखकर भयभीत भी हुआ और उत्साहित भी। उसने देवदासी को बताया–

–यही है वह ! अब तुम अपने उरोजों का आवरण हटा दो...शरमाओ नहीं। देरी मत करो। तुम्हें नग्न देख कर वह तुम्हारी ओर खिंचा चला आएगा और तब तुम उसे अपने वश में कर लेना...

देवदासी रूना ने अपने को नग्न किया और अन्तत: उसने एंकिदू को आकर्षित कर लिया। देवता अनु ने कहानी रोक कर बताया–आश्चर्य की बात तो यह थी कि संभोग सुख के बाद भी एंकिदू उस देवदासी से अलग नहीं हुआ...वह उसे अपनी बलिष्ठ बाँहों में लेकर तरह-तरह से देखता रहा था। न मालूम वे एक दूसरे की आँखों में क्या तलाशते रहे...मुझे तो लगता है कि यह प्रेम नाम की भावना थी जो मनुष्य ने स्त्री में तलाश ली है...मेरा माथा तभी ठनका था। एंकिदू प्रेम की उस आसक्ति में यह भी भूल गया कि वह मनुष्य के रूप में आकाश देवता का पुत्र है मैं उसे यह कैसे याद दिलाता। मैं कुछ कर नहीं सकता था। एंकिदू और देवदासी छह दिन और सात रातों तक साथ-साथ रहे, तब एक दिन देवदासी ने कहा–

–तुम कितने चतुर और बद्धिमान हो एंकिदू...तुम अवतारी पुरुष हो, पर मैं तुम्हें साधारण मनुष्य के रूप में ज्यादा पसंद करूँगी। इन वन्य पशुओं का साथ छोड़ो और चलो मेरे साथ। मैं तुम्हें युरुक की भव्य दीवार और महान मन्दिर दिखाऊँगी। वहाँ अनु और ईश्तर निवास करते हैं। वहाँ सम्राट गिलगमेश हैं...वे महाशक्तिशाली हैं...वे हम जैसे मनुष्यों की सृष्टि की रचना कर रहे हैं। आखिर देवदासी रूना ने एंकिदू को साधारण मनुष्य की तरह बना लिया। उसके वन्य-बालों को साफ़ किया। अपने कपड़ों का एक भाग उसे दिया। दूध पीना और कंद मूल खाना सिखाया और उसे लेकर युरुक के लिए रवाना हो गई। जब देवदासी रूना एंकिदू को लेकर नगर में दाख़िल हुई तो उसे देखने के लिए अपार जन-समूह उमड़ पड़ा। भव्य दीवार के द्वार पर एंकिदू का आमना-सामना गिलगमेश से हुआ।

दोनों ने एक दूसरे को जलती आँखों से देखा। एंकिदू के नथुनों से जोरों की घरघराहट निकलने लगी। गिलगमेश भी योद्धा की तरह हुंकारा और दोनों एक दूसरे से पथरीले साँड़ों की तरह भिड़ गए ! धरती धसकने लगी...मन्दिर के द्वार ध्वस्त हो गये...

अनु ने आगे बताया–

–मैं उन दोनों का द्वन्द्व युद्ध देख रहा था। मुझे विश्वास था कि एंकिदू विजयी होगा, लेकिन आश्चर्य की बात कि गिलगमेश ने एंकिदू को ऐसा दबोचा कि वह छटपटाने लगा। उसने एंकिदू के घुटनों को मरोड़ा और उसे उठाकर वायुमंडल में फेंक दिया...काफी देर एंकिदू वायु में सूखे पत्ते की तरह चकराता रहा, फिर जब वह धरती पर गिरने लगा तो गिलगमेश ने उसे अपनी बाँहों में सँभाला और सामने खड़ा कर लिया, और पूछा–बता मेरे विनाश के लिए तुझे किसने भेजा है ?

अभी एंकिदू मनुष्य की छल-चतुराई से दूर था। उसने मेरा नाम ले दिया। गिलगमेश भड़क उठा। उसने कुछ कठोर अपशब्द मेरे लिए कहे। वह चीखने लगा–तो देवता अनु ने तुम्हें मेरे विनाश के लिए भेजा है ! वही देवता अनु, जिसके लिए मैंने भव्य दीवार और मंदिर बनवाया था ! जिसे मैंने श्रद्धा से देवता का पद दिया था ! जिसके लिए मैंने अपनी समस्त प्रजा से कहा था कि इसकी पूजा करो ! मुझे मालूम नहीं था कि वह देवता अनु इतना कृतघ्न निकलेगा !...वह यह भूल गया कि समस्त देवताओं का अस्तित्व मात्र मुझ जैसे मनुष्य के कारण है !

यह सुनकर सारे देवता क्रोधित हो उठे। वपुन तो भड़क ही उठा–तो सम्राट गिलगमेश इतना अहंकारी हो गया है ! इसके इस अहंकार को तोड़ना ही होगा !

–यह अब असंभव है, क्योंकि भव्य दीवार के पास हुई उस मुठभेड़ में एंकिदू को परास्त करने के बाद, न मालूम क्यों सम्राट गिलगमेश ने एंकिदू से मित्रता कर ली। वे दोनों परम मित्र हो गए हैं।

–यह तो ख़तरनाक ख़बर है ! अक्कादी सभ्यता का देवता सुरु घबरा कर बोला।

–यही तो...यही तो...परम देवता अनु ने कहा–भयानक बात यह है कि पृथ्वी सम्राट गिलगमेश ने मित्रता नामक तत्व को भी तलाश लिया...

यह सुनकर सारे देवता बेहद चिन्तित और हताश हो गए। तब मेसोपोटामिया के देवता अलवोनियस ने संकटग्रस्त स्वर में कहा–देवताओं के देव अनु ! हमारी कमज़ोरी यही है कि हमने प्रेम और मित्रता जैसे तत्वों को नहीं तलाशा..सारी देवियां केवल हमारी वासनाओं का तृप्ति-कुण्ड हैं और हम देवताओं में कोई भी किसी का मित्र नहीं है...इसलिए मनुष्य द्वारा प्रेम और मित्रता जैसे तत्वों की खोज बहुत ही विकराल साबित हो सकती है। यह हम देवताओं के अस्तित्व के लिए भयानक खतरा बन सकती है। यह स्थिति विस्फोटक है...

वहाँ मौजूद तमाम देवताओं ने अलवोनियस की चिंता का एक स्वर में अनुमोदन किया। और देवी तानिया ने तब उन्हें आगाह करने वाला विदग्ध भाषण दिया–

–दज़ला, फ़रात और डैन्यूब की परा-धरती के समस्त देवताओं ! तुम सब आज चिन्तित हो क्योंकि मनुष्य ने प्रेम तथा मित्रता जैसे नए तत्वों को खोज लिया है, लेकिन तुम्हें किसने रोका था ? तुम सब घोर अहंकारी हो ! तुम यह भूल गए कि मनुष्य ने ही तुम्हें सिरजा है। मनुष्य के बिना तुम्हारी और हम जैसी देवियों की कोई औक़ात या अस्तित्व नहीं है। तुम समस्त देवता लोग प्रेमविहीन और एकांगी व्यक्ति हो। तुम सब स्त्री पर आसक्त होकर उसका शीलभंग कर सकते हो...अवैध सन्तानें पैदा कर सकते हो, क्योंकि तुम अहंमन्य हो। तुम नितान्त व्यक्तिवादी हो। तुम्हारे पास मित्रता का मूल्य नहीं है। तुम एक दूसरे के पूरक नहीं हो। तुम हमेशा एक दूसरे से स्पर्धा करते हो। तुम्हारे सारे आचरण अवैध हैं इसीलिए तुम किसी वैध सभ्यता या संस्कृति का निर्माण नहीं कर सके हो। तुम सब भूल रहे हो...धरती के मनुष्य ने प्रेम और मित्रता के अलावा प्रजनन की वैध परम्परा का आविष्कार भी कर लिया है, इसीलिए उन्हें संस्कार जैसी महाशक्ति भी प्राप्त हो गई है...तुम्हारे पास केवल वासना है, प्रेम नहीं है। केवल वैयक्तिक श्रेष्ठता का द्वेष है इसलिए मित्रता नहीं ! तुमने स्त्री को मात्र भोग्या मान कर अवैध संतानों का देवलोक स्थापित कर लिया है, पर इस देवलोक के पास कोई संस्कार या परम्परा नहीं है...

–देवी तानिया ! तुम अपने ही वंशजों का अपमान कर रही हो ! तमाम देवता और कुछ देवियाँ एक साथ चीख़ उठे।

–मैं अपमान नहीं, सिर्फ़ तुम्हें आगाह कर रही हूँ...मनुष्य ने जिन जीवन-तत्वों को तलाशा है और आगे तलाशेगा वह हमारी मृत्यु की घोषणा होगी....देवी तानिया ने कहा और वह अन्तर्ध्यान हो गई।

सारे देवता अवाक् और हत्प्रभ रह गए। और तब अपने अस्तित्व की रक्षा को लिए परमदेवता अनु ने सुझाव दिया–

–अस्तित्व के संकट की इस घड़ी में हमें सप्तसिंधु के आर्य देवताओं से सम्पर्क करना चाहिए...हमारे पास केवल तीन नदियाँ हैं–दज़ला, फ़रात और डैन्यूब ! हमें केवल इन तीन नदियों की सम्पदा मिली है। उनके पास सप्तसिंधु की सात मुख्य नदियाँ हैं–सिंधु, वितस्ता, असिकी, परुष्षणी, विपाश्, शुत्रद्री और सरस्वती !

–इतना ही नहीं देवाधिदेव ! संदेशी ने आदर से सर झुका कर कहा। वह आगे कुछ कहता, इससे पहले एक देवता ने टोका–तुम कौन ?

–श्रीमन् ! हम तो घुमंतू पशुपालक हैं, पर आपके संदेशी का कार्य भी करते हैं। हम तो सप्त सिंधु से लेकर आपके प्रदेश तक और यहाँ से लेकर बालेशिया, पाषाण क्षेत्र से लेकर बास-फोरस और दर्रे दानियाल तक हमेशा घूमते ही रहते हैं...यहीं से होकर तो आर्य कबीले सिंधु घाटी तक गए हैं...उन्हीं में से कुछ कबीले आर्याना में बस गए हैं। जो आगे बढ़ते गए वे सिंधु, सरस्वती और दृषाद्वंती नदियों को पार करके यमुना के मध्यदेश तक पहुँच चुके हैं...उसे वे ब्रह्मावर्त के नाम से पुकारते हैं। पूरब की ओर उनका सीमान्त जो नदी बनाती है, उस नदी का नाम है–गंगा ! आर्य देवताओं ने साम्राज्य स्थापित कर लिया है। उनके साम्राज्य में उत्तर पश्चिम की और चार नदियों की संपदा भी मौजूद है।

–क्या आर्यों ने उन नदियों का नामकरण कर लिया है ?

–हाँ श्रीमन् ! उन्होंने उनका नामकरण करके अपनी सम्पदा बना लिया है। आर्याना के आर्य इसी लिए पिछड़ते गए, क्योंकि उन्होंने नामकरण की पद्धति नहीं अपनाई। आर्यों ने उत्तर पश्चिम की नदियों को नाम दिए हैं–काबुल-कुमा, क्रूमु-कुर्रम, गोमती-गोमल और स्वात-सुवास्तु !

–इतने दीर्घ नाम ?

–हाँ श्रीमन् ! नदियों के नामकरण के साथ-साथ उन्होंने भू-भागों को भी अंकित कर लिया है। हम तो घुमंतु हैं, जब भी आर्य प्रदेशों तक जाते हैं तो गांधारी जनपद से पशुकेश ले आते हैं। मूजवंत में पहुँचते हैं तो श्रेष्ठ सुरापान का आनन्द उठाते हैं... फिर हम उनके द्रुह्य और तुर्वश प्रदेशों में रुकते हैं, तो यव और धान्य भी प्राप्त कर लेते हैं। इन प्रदेशों का अन्न अद्वितीय है। श्रीमन् ! आर्यों के पास जल सम्पदा के अलावा सौन्दर्यशाली प्रात:कालीन ऊषा है। पर्वत, पर्जन्य, विद्युत, मेघ और घनघोर वर्षा है...उन्होंने अपने क्षेत्र को वैदिक गणों और जनों में विभक्त कर रखा है...उनके पास अश्व हैं, गो हैं और अन्य पशु भी हैं। वे कृषि कर्म करने लगे हैं !

–यह श्रम क्या आर्य देवता स्वयं करते हैं ? देवता अनु ने पूछा।

–नहीं श्रीमन् ! आर्य देवता आप सब देवताओं की तरह ही कर्म-विहीन हैं। उन्हें श्रम की ज़रूरत ही नहीं है...श्रम तो उन देवताओं की मनुष्य जाति ही करती है

–परमेदव अनु ! तभी एक देवता ने हस्तक्षेप किया–हमें सन्देशी के वृत्तान्तों में नहीं उलझना चाहिए। हमारी समस्या तो सम्राट गिलगमेश है जो मृत्यु की औषधि तलाशने की घोषणा कर चुका है !

–महामान्य ! सन्देशी ने उन्हें शान्त किया–मैं आपकी इस महती समस्या के लिए ही सारे वृत्तान्त दे रहा हूँ, ताकि आप इस समस्या को पूरे परिप्रेक्ष्य में समझ सकें...देखिए, यहाँ आकर एंकिदू भूल गया कि वह आकाश-पुत्र है। मनुष्य बनते ही उसने प्रेम नामक संवेग को तलाशा और स्थापित कर लिया। सम्राट गिलगमेश ने मित्रता जैसी वृत्ति को खोज लिया। और उधर आर्य मनुष्य ने पृथ्वी के महातत्व श्रम को खोजा और आतंककारी प्रकृति को वशीभूत करने के लिए उसने शांति जैसी महाशक्ति का आविष्कार कर लिया है...शांति के बाद अब यदि मनुष्य को अन्तिम रूप से कुछ तलाशना है, तो वह है–मृत्यु की औषधि ! श्रीमन् ! आप देवताओं का पराभव निश्चित है !

संदेशी की यह बात सुनते ही देव मंडलियों के प्रत्येक देवता की भृकुटियाँ तन गईं। उनकी आँखों से क्रोध बरसने लगा।

–क्रोधित मत होइए महामान्य ! सत्य को स्वीकारिए...मनुष्य ने जिन महाशक्तियों का अन्वेषण किया है, वे आपके पास नहीं हैं। उसने आविष्कृत कर लिया है–जीवन, कर्म, श्रम, प्रेम, मित्रता और शांति जैसे जीवन के महातत्वों को... इसलिए अब उसकी अमरत्व की कामना अनुचित नहीं है !

–नहीं ! नहीं ! उसकी यह कामना हमें स्वीकार नहीं है ! तमाम देवता समवेत चीख़ने लगे....फिर अलग-अलग घोषणाएँ करने लगे–

–हम कर्म को कर्महीन बना देंगे ।

–हम श्रम को श्रमसाध्य बना देंगे।

–हम प्रेम के विरुद्ध घृणा का सृजन करेंगे ।

–हम मित्रता को शत्रुता में बदल देंगे !

–हम शांति को अशान्ति से ध्वस्त कर देंगे ।

–हम जीवन को मृत्यु से उन्मुक्त नहीं होने देंगे !

तभी तीन देवियों–ईना, सुसोति और कल्पा ने वहाँ प्रवेश किया। उन्हें देवताओं ने आश्चर्य से देखा। देवता अनु ने उनसे प्रश्न किया–तुम तीनों इस समय यहाँ क्यों आई हो ? कोई विशेष कारण ?

–हम तीनों देवलोक दोड़कर मृत्युलोक जा रही हैं। हम स्त्रियाँ तुम्हारे पापाचार से पीड़ित हैं। तुमने हमें मात्र भोग्या बना रखा है...प्रेम की वह मर्यादा जो मनुष्य ने विकसित कर ली है, उसका लेश मात्र अंश तुम में नहीं है। तुम सब व्यभिचारी हो। क्लीव हो। और तुम्हीं नहीं, सिन्धु सभ्यता के देवता भी तुम्हारी ही तरह हैं। अप्सराओं को देखते ही उनका तप भंग हो जाता है। वे वीर्यपात करने लगते हैं। तुम्हारे सखा जीयस इस समय भी पाषाण प्रदेश के मन्दिर में देवदासी इष्टा के साथ रतिमग्न हैं...देवता सुवोग डैन्यूब नदी के किनारे देवी परंती के साथ संभोग में लिप्त हैं...सिन्धु सभ्यता का ब्रह्मा अपनी पुत्री शतरूपा सरस्वती पर आसक्त होकर पिछले सौ दिव्य वर्षों से उसके साथ संभोग में लिप्त है। तुम सब भी सूर्य को पूजते हो, आर्य भी पूजते हैं। उसी सूर्य ने अपने भाई विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा को अपनी पत्नी बना रखा है। चन्द्रमा को भी तुम दोनों की सभ्यताएँ पूजती हैं। आर्य सभ्यता में वह ब्राह्मणों, औषधियों और तारागणों का सम्राट है। जानते हो, उसने त्रिभुवन को जीत कर राजसूय यज्ञ किया था। उस महायज्ञ में त्रिभुवन सुन्दरी, देवताओं की गुरु-पत्नी तारा भी आई थी। चंद्र गुरु-पत्नी पर इतना मोहित हो गया कि वह बलपूर्वक तारा का अपहरण कर लाया। देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी लौटा देने के लिए चंद्र को कई बार प्रार्थनापूर्वक समझाया, परंतु चंद्र तो कामान्ध था। वह गुरु पत्नी तारा के साथ बलात्कार और व्यभिचार करता रहा। आखिर भीषण युद्ध के बाद गर्भवती तारा को चन्द्रमा से जीत कर लाया गया...कहाँ तक गिनाया जाए ! तुम देवताओं की समस्त सभ्यताएँ निर्लज्ज हैं। पातकी हैं। गुरु-पत्नी से सम्भोग करने के बाद भी तुमने उसे पतित भी नहीं ठहराया...

परमदेवता अनु के साथ ही सारे देवता अवाक् थे...उनमें साहस नहीं था कि वे तीनों देवियों ईना, सुसोति और कल्पा से कोई तर्क-वितर्क कर सकें या प्रश्न पूछ सकें। कुछ पलों की निस्तब्धता के बाद परमदेवता अनु ने इतना ही पूछा–तुम तीनों तो देव योनि की हो...आयुष्मती हो, मृत्यु से मुक्त हो...तुम मर्त्यलोक में सीमित आयुवाले नश्वर मनुष्यों के साथ कैसे और कब तक रह सकोगी ? कितने पुरुषों के साथ जीवन व्यतीत करोगी ?

–उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी...तुम्हें नहीं मालूम...तुम सबकी चहेती देवी, तुम्हारे स्वर्ग की रानी ईश्तर स्वयं सम्राट गिलगमेश जैसे मनुष्य के पास प्रणय निवेदन लेकर गई थी ! जानते हो तब उस नश्वर गिलगमेश ने क्या कहा था ? यही कि यह असम्भव...है...मैं तुमसे प्रेम नहीं करता, इसलिए मैं तुम्हारे शील की रक्षा नहीं कर पाऊँगा...कहते-कहते ईना की साँसें तेज हो गई थीं, उसने उन्हें धिक्कारते हुए पूछा–कहीं है तुम देवताओं के पास इतना स्फटिक साहस और इतनी विराट नैतिकता ?

देवता सहमे हुए एक दूसरे को देख रहे थे। तभी सुसोति बोल पड़ी–परमदेवता अनु में भी इतना साहस नहीं कि ये ईश्तर के साथ घटित इस घटना का सत्य बता सकें...लेकिन वह सत्य मैं बताती हूँ–सम्राट गिलगमेश द्वारा किए गए इनकार को ईश्तर बर्दाश्त नहीं कर पाई थी। अपमानित ईश्तर तब इन्हीं के पास पहुँची थी और उसने गिलगमेश पर लांछन लगाया था–परमदेव अनु ! नश्वर मनुष्य सम्राट गिलगमेश ने मेरा अपमान किया है...देवलोक की देवियों को उसने पतिता कहा है। उसने आरोप लगाया है कि हम देवियाँ नहीं, व्यभिचारिणी वेश्याएँ हैं। किसी को नहीं मालूम कि एक देवी कितने देवताओं की अंकशायिनी रह चुकी है ! कहते कहते सुसोति ने आवाज़ ऊँची कर के परमदेव अनु से पूछा–बोलिए ! यह वृत्तान्त सत्य है या नहीं ?

सभी उपस्थित देवता लोग परमदेव अनु को शंका भरी दृष्टि से देख ही रहे थे कि देवी कल्पा ने बात और आक्षेप का सूत्र पकड़ लिया–एंकिदू के हृदय परिवर्तन के बाद तब इन्हीं परमदेव अनु ने सम्राट गिलगमेश को नष्ट करने के लिए एक भयंकर और विकराल साँड़ को जन्म देकर पृथ्वी पर भेजा था...यहीं पर मित्रता नामक मूल्य की परीक्षा पहली बार हुई थी। उस पागल विकराल वृषभ ने जैसे ही गिलगमेश पर आक्रमण किया, तो मित्रता का धर्म निबाहते हुए एंकिदू ने उस साँड़ को सींगों से पकड़ लिया। उनमें घमासान मुठभेड़ें हुईं। साँड़ ने एंकिदू के चेहरे पर ज्वलनशील आग उगलते हुए कहा–एंकिदू ! क्या तू भूल गया कि हम दोनों को एक ही परमदेवता अनु ने जन्म देकर धरती पर भेजा है...क्या तू भूल गया कि हम दोनों का लक्ष्य गिलगमेश की हत्या है !

तब एंकिदू ने उसके विशाल सिर को सींगों से पकड़ कर झकझोरते हुए कहा–ऐ वृषभ, तू विवेकहीन पशु है...तुझे तो क्या, देवराज अनु को भी नहीं मालूमा कि मित्रता किस चिड़िया का नाम है ! मेरे जीवित रहते मेरे मित्र गिलगमेश को कोई नहीं मार सकता !

यह सुनते ही वृषभ ने उन्मत्त होकर भयंकर आक्रमण किया तो सम्राट गिलगमेश ने वृषभ की गर्दन और पृष्ठ भाग पर तेज़ प्रहार किए...अन्तत: वह साँड़ मारा गया। लेकिन एंकिदू बुरी तरह घायल हो गया था, उसकी स्थिति मृतक-सी हो गई थी। गिलगमेश ने यूनान के बड़े से बड़े वैद्यराजों और हकीमों को बुलाकर उपचार करवाया। देवदासी रूना ने, जिसने एंकिदू से प्रेम किया था, बहुत सेवा की। गिलगमेश अपने मरणासन्न मित्र को धीरज बँधाता रहा–मित्र एंकिदू ! तुम जीवित रहोगे...ऊर और कीश के कब्रिस्तानों में अब कोई मनुष्य दफ़्न नहीं होगा...मनुष्य जीवित रहेगा...! फिर उसने एंकिदू को देखा तो उसका दिल दहल उठा। वह उसे छू-छू कर विलाप करने लगा–मित्र एंकिदू ! कैसे हो तुम ? कैसी नींद है यह ? इस नींद ने तुम्हें क्यों जकड़ लिया है ? एंकिदू मेरे मित्र ! तू काला क्यों पड़ गया है? तू मेरी आवाज़ क्यों नहीं सुनता ?

गिलगमेश के विलाप के बावजूद एंकिदू ने आँखें नहीं खोलीं। गिलगमेश ने उसके हृदय पर हाथ रखा, उसकी गति बन्द थी...वह फूट-फूट कर रोने लगा–मित्र एंकिदू...तूने मेरे लिए पीड़ा सही है। मेरी यातना तूने अपने ऊपर ली है...तूने मित्रता के नाते मृत्यु का वरण किया है। और तब अपने आँसू पोंछ कर सम्राट गिलगमेश ने घोषणा की–

–सुनो ! देवताओ सुनो ! पृथ्वी सम्राट गिलगमेश की आवाज़ ! यह दूसरी आवाज़ है ! यह भोग-विलास और पशुवत् दैहिक ऐश्वर्य की आवाज़ नहीं, यह मनुष्य की पीड़ा, दु:ख, यातना, श्रम और मृत्यु से उसे मुक्त करने की आवाज़ है !

ईना चीखी–आगे सुनो...सुनो...और गिलगमेश की आवाज़ फिर गूँजने लगी।

–मैं पीड़ा से लड़ूँगा...यातना सहूँगा...कुछ भी हो मैं अपने मित्र और मनुष्य मात्र के लिए मृत्यु को पराजित करूँगा ! मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊँगा !

सम्राट गिलगमेश की घोषणा से एक बार फिर देवलोक काँपने लगा...देव सभ्यताएँ अवसन्न रह गईं।

तभी ईना ने घोषित किया–प्रलय के समय आर्य सभ्यता की एक मत्स्य कन्या ने गिलगमेश को अमरता प्राप्त करने का रहस्य बताया था...मत्स्य कन्या के कहे मुताबिक गिलगमेश ने मृत्यु के विरुद्ध जीने की शक्ति रखने वाले सभी जीवकणों-अणुओं को अपनी नाभि में छुपा लिया था। इसीलिए वह जल प्रलय में जीवित रह सका। उस मत्स्य कन्या ने ही उसे शुरुप्पक नगर के जिउसुद्दु की जानकारी दी थी, जिसके पास मृत्यु से मुक्ति की औषधि सुरक्षित थी। किसी को मालूम नहीं था कि जल प्रलय के बाद शुरुप्पक का वह जिउसुद्दु उस औषधि को लेकर कहाँ छुप गया था। तो सुनो सुमेर सभ्यता के देवताओं ! सम्राट गिलगमेश निश्चय ही शुरुप्पक के उस जिउसुद्दु का पता लगाकर रहेगा...उस औषधि को प्राप्त करके रहेगा, जो मनुष्य को अमरता देगी...इसलिए हम तीनों तुम्हारा देवलोक छोड़कर मर्त्यलोक में जा रही हैं ! क्योंकि सम्राट गिलगमेश उस सागर तक पहुँच गया है, जहाँ से वह जल मार्ग जाता है जहाँ अतल जलराशि के नीचे के प्रदेश में शुरुष्पक का जिउसुद्दु मृत्यु से मुक्ति की औषधि लिए छुपा बैठा है...

यह सूचना सुनते ही देवताओं की मंडली में फिर भूकंप आ गया। अब क्या होगा ? क्या दूसरी प्रलय होगी ? कोलाहल और जबरदस्त शोर के बीच परमदेवता अनु ने ऐलान किया–इससे पहले कि गिलगमेश सागर की अतल गहराइयों में उतर सके, उसे बन्दी बनाया जाए !

–अब तुम उसकी परछाईं को भी बन्दी नहीं बना सकते ! ईना ने कहा।

–रोको ! रोको ! परमदेवता ने अपनी सृष्टि के विषैले जीव-जन्तुओं को पुकारा–विषधर भुजंगो, विषैले वृश्चिको ! गिलगमेश को अपने नागपाश में ले लो। अपने विषैले दंश से उसके शरीर को निष्प्राण कर दो...

और तब तीनों देवियों ने देखा–समुद्र में छलाँग लगाने के लिए उद्यत गिलगमेश के शरीर पर सैकड़ों विषैले सर्प लिपट गए थे। उन्होंने उसे जकड़ लिया था। सैकड़ों बिच्छू उसके शरीर पर डंक मार रहे थे...

यह दृश्य देखकर देवियाँ विचलित हो उठीं। लेकिन तभी गिलगमेश ने उन विषैले विषधरों और वृश्चिकों की परवाह न करते हुए अपनी बलिष्ठ भुजाओं को पसारा...और...और...उसने उस सागर में छलाँग लगा दी...

सागर ने अपनी उत्ताल तरंगों में उसका स्वागत किया और कहा–धरती पुत्र ! जब तक तेरा एक अंग भी सक्रिय रहेगा, तब तक इन विषधरों और वृश्चिकों का विष प्रभावहीन होता जाएगा...मेरा जल पृथ्वी के हर विष को शमित करता है...तू पाताल लोक की अपनी यात्रा पूरी कर !

और गिलगमेश अथाह पानी के उस तलहीन संसार में नीचे उतरता गया...उतरता चला गया।

सदियाँ बीत गईं। और अब तक गिलगमेश की यात्रा जारी है...औषधि की तलाश में वह अब भी सागरतल की गहराइयों में उतरता जा रहा है...उतरता जा रहा है...





6


सदियाँ बीत गईं। मृत्यु से मुक्ति की औषधि लेकर मनुष्य सम्राट गिलगमेश अभी लौटा नहीं है।

लेकिन देवदासी रूना और वन्य पुरुष एंकिदू ने प्रेम नामक जिस संवेग का अन्वेषण सहज ही कर लिया था, उसे मृत्यु का भय नहीं था। मनुष्य जाति में वह जीवित, जाग्रत और सदा-सदा के लिए स्थिर हो गया था। उसे मृत्यु मार नहीं सकती थी। अग्नि जला नहीं सकती थी। वायु उड़ा नहीं सकती थी। शस्त्र उसे काट नहीं सकता था। सागर उसे डुबो नहीं सकता था...मृत्यु की तरह यह अकाट्य सत्य उस दिन स्थापित हो गया था, जिस दिन मिस्र के एक मन्दिर की पथरीली दीवार पर किसी धातु के नुकीले कलम से यह वाक्य उत्कीर्ण मिला था–‘मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा है।’

यह दुनिया की प्रथम प्रेम कहानी थी ! इस प्रथम प्रेम कहानी के बाद मिस्र के पिरामिड बने थे।

पिरामिडों के इतिहास से ज़्यादा बड़ा और पुराना है मनुष्य के प्रेम का इतिहास। देवदासी रूना और वन्य पुरुष एंकिदू के वे एकान्त क्षण, जब वासना के बाद उन्होंने एक दूसरे की आँखों में अपने अस्तित्व की तलाश की थी और उसे प्राप्त किया था। प्रेम की यही शाश्वत कहानी तब से साँस ले रही है !





7


उसी कहानी में शामिल है बूटा सिंह और रेतपरी की यह कहानी।

राजस्थान का तपता रेगिस्तान...

कोई चीख़ा–बन गया साला पाकिस्तान...

आसमान की आँखें सूखी हुई थीं। उनमें एक बूंद भी पानी नहीं था। मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने सूचना दी थी कि इस बार धरती वर्षा के पानी से नहीं, मानव रक्त की बरसात से सींची जाएगी...

इन्हीं घोषणाओं के बीच पचास-पचपन साल का सिख किसान बूटा सिंह अपने बंजर खेतों की ओर से लौट रहा था। उसके तीन भाई थे, लेकिन खेतों की जायदाद का बँटवारा न होने पाए, इसलिए उन्होंने बूटािसंह की शादी नहीं होने दी थी। वह अभी तक कुँवारा था। उस रेगिस्तानी धरती की तरह, जिस पर वर्षा की एक बूँद तक नहीं गिरी थी। वह बूटा सिंह अपने बांझ खेतों की ओर से घर को वापस जा रहा था...

आवाज़ें गूंज रही थी–

–बन गया साला पाकिस्तान...

–जो बोले सो निहाल...सत् सिरी अकाल...

–नारए तकबीर...अल्लाहो-अकबर

–हर हर महादेव...

बूटा सिंह को पता नहीं था कि मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने क्या सूचना दी थी। वह इस बात से बेख़बर था कि आज़ादी के इस साल पानी की जगह खून की बरसात होने वाली थी। बूटासिंह रेत पर रास्ता बनाता चला जा रहा था। यह रास्ता वह रोज़ बनाता था जो रोज़ मिट जाता था...घर पहुँचने की भी उसे कोई जल्दी नहीं थी। किसी की आँखें उसके लौट कर आने का रास्ता नहीं देखती थीं।

तभी पीठ पीछे उसे एक डरी हुई कमसिन आवाज़ सुनाई दी–बचाओ...बचाओ...

बूटा सिंह ने पलट कर देखा। एक सोलह-सत्रह साल की लड़की अपनी अस्मत की रक्षा के लिए उसकी ओर दौड़ती चली आ रही थी। उसके कपड़े तार-तार थे। बाल बिखरे हुए और वह बुरी तरह हाँफ रही थी। एक हिंसक-सा नौजवान उसका पीछा कर रहा था। वह अधनंगी लड़की बूटासिंह के पैरों पर आ गिरी–मुझे बचाओ...मुझे बचाओ...यह दरिन्दा मेरी इज्ज़त लूटना चाहता है...कहती हुई वह उठी और बूटासिंह से चिपक कर हाँफने लगी।

–तू बच के कहाँ जाएगी ! उस हिंसक नौजवान ने लड़की से कहा, फिर वह बूटासिंह से बोला–इसे मेरे हवाले कर दो !

–नहीं...इस मैं तुम्हारे हवाले नहीं करूँगा !

–तुम्हें करना होगा...यह मेरे हिस्से में आई है !

–हिस्से में...बूटासिंह ने आँखें तरेर कर पूछा–तेरे हिस्से में ?

–हाँ ! हिन्दू-मुसलमान का बँटवारा हो चुका है। पाकिस्तान बन चुका है।

–कहाँ बन चुका है पाकिस्तान ?

–तीसरी ढाँणी के उस पार...पाकिस्तान बनने की लकीर खिंच चुकी है। उसी लकीर के बाद यह मुसलमान लड़की मेरे हिस्से में आई है...मैं इसे काफ़िले वालों से छीन कर लाया हूँ...इसे मेरे हवाले कर दो !

–नहीं ! बूटासिंह ने उस अधनंगी लड़की को पीठ के पीछे छिपाते हुए कहा–हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की लकीर खिंच गई तो खिंच जाए...लेकिन हिन्दू-मुसलमान के नाम पर औरत की इज्जत का बँटवारा तो नहीं हो सकता !

उस हिंसक नौजवान ने तेज़ नज़रों से बूटासिंह को देखा और बोला–तुम चाहो तो इसकी इज्ज़त खरीद लो !

–खरीद लूँ ! बूटासिंह ने अचकचाते हुए कहा–तुम बेचने को तैयार हो ?

–हाँ !

–कितने में ?

–नक़द पन्द्रह सौ ! उस हिंसक नौजवान ने बूटासिंह की औक़ात देखकर चढ़ते दाम बताए।

–ठीक है। इतने पैसे तो कर लूँगा...आओ मेरे साथ। घर तक चलना पड़ेगा।

तीनों लोग घर की ओर चल दिए। हिंसक नौजवान बूटासिंह के साथ आगे-आगे चल रहा था और लड़की सर झुकाए उनके पीछे-पीछे।

घर पहुँच कर बूटासिंह ने एक कोने में जाकर पुराने घड़ों और हांडियों में हाथ डाल-डाल कर पैसे तलाशे पर कुछ हाथ नहीं आया। वह हिंसक नौजवान इंतजार में खड़ा था। अधनंगी लड़की अपना बदन चुराए, दोनों बाँहें लपेटे, गठरी बनी दूसरे कोने में बैठी थी। आख़िर आड़ करके बूटा सिंह ने रेती हटा-हटा कर उसमें गड़ी एक हंडिया निकाली। मैले से कपड़े के टुकड़े में बंधी उसने धरोहर वाली अपनी पोटली निकालकर खोली और मुड़े-तुड़े मैले-कुचैले नोट गिनने लगा। कुछ सिक्के भी थे। आख़िर पैसे पूरे पड़ गए।

हिंसक नौजवान ने पैसे गिने, अपनी पगड़ी में रखे और लड़की पर नज़र डालकर बोला–बुड्‌ढा है...आराम से रहेगी...

लड़की वैसी ही गठर